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Sunday, 10 July 2016

हमारी सोच पर हावी होता सोशल मीडिया

           हमारे एक पुराने मित्र मिलते ही बिफर पड़े, 'कैसे पत्रकार हो भाई आप! स्विस बैंक में खाताधारकों के नाम पब्लिक हो गए और आपको खबर तक नहीं!' उनका दावा और गुस्सा देख एक पल को हम भी भौचक्के रह गए. इतनी बड़ी बात हो गयी और मुझे पता कैसे नहीं चला, मेरे तो पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. इससे पहले कि मैं उनसे कुछ पूछता, गुस्से में मुट्ठियां भींचते उन्होंने मेरी सारी आशंकाओं पर विराम लगा दिया. बोले,'व्हाट्सएप वगैरह चलाते हो कि नहीं? तुम मीडिया वालों ने तो पैसा खा रखा है, तुम क्यों सच बताओगे.'


हां, सही तो है. हम क्यों सच बताने लगे, सच बताने और हर छुपी बात सामने लाने का ठेका तो व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर पर आपके हितैषियों ने ले रखा है. जो कभी स्विस बैंक के खाताधारकों में पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को शामिल कर देते हैं तो कभी हेलन की फोटोशॉप तस्वीर को कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी की जवानी से जोड़ देते हैं. इतना ही नहीं ये हितैषी ही आपको ऐसा मैसेज भेज सकते हैं, जिसे तीन ग्रुप्स में फॉरवर्ड करते ही आपका फ़ोन 100 प्रतिशत चार्ज हो जायेगा, या फिर आपको 5 जीबी डेटा फ्री मिलेगा. हमारे बस में तो इतना सब नहीं है.
          बेशक आप समझ चुके होंगे मेरा इशारा किस तरफ है! यूं तो सोशल मीडिया संचार क्षेत्र में क्रान्ति लेकर आया है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसका उपयोग अफवाहों को फैलाने और झूठा प्रचार करने के लिए बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. यही नहीं, इससे जुड़े कुछ उदहारण शायद आपको बेवकूफाना लगें लेकिन करोड़ों लोग जानबूझकर ऐसी बेवकूफियां करते हैं और दूसरों को भी अपने कुटुंब में शामिल करना चाहते हैं.
         सिर्फ एक मैसेज और मेरे दोस्तों ने कुरकुरे खाना काम कर दिया, फ्रूटी पीनी छोड़ दी. इस मैसेज में कहा गया था कि कुरकुरे में प्लास्टिक है, सबूत पेश हुआ कि आप चाहें तो इसे जलकर देख लें, ये प्लास्टिक की तरह जलता है. और तो और कहा गया कि फ्रूटी की फैक्ट्री में कुछ एचआईवी पॉजिटिव वर्कर्स ने अपना खून फ्रूटी में मिला दिया है, तो सावधान आपको भी एचआईवी हो सकता है. सच तो यह है कि कुछ भी खाने-पीने से एड्स का वायरस नहीं फैलता, कुरकुरे भी प्लास्टिक नहीं स्टार्च की वजह से अलग तरह से जलता दिखता है. इन ख़बरों का सच से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन बड़े तबके ने इन पर विश्वास कर लिया. सिर्फ निरक्षर और पिछड़ा वर्ग ही नहीं, मॉडर्न सोसाइटी के पढ़े लिखे लोगों ने भी इस पर यकीन किया. 
           एक और बड़ी खबर व्हाट्सएप, फेसबुक सोशल मीडिया के ज़रिये तेजी से फैली, इसमें कहा गया कि राष्ट्रगान 'जन गण मन' को यूनेस्को ने बेस्ट राष्ट्रगान का खिताब दिया है. खबर फैलने की देरी थी कि बधाइयों का दौर शुरू हो गया. भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने ट्विटर पर बधाई भी दे डाली. बाद में यह खबर भी झूठ निकली. कुछ इसी तरह एक तस्वीर शेयर की जाने लगी जिसे नासा द्वारा दीवाली पर्व के वक़्त ली गई भारत की तस्वीर बताया जाने लगा. लोग धड़ाधड़ शेयर करते गए और मूर्ख बनते गए. जबकि इसका सच  तक कोई वास्ता नहीं था. ये तस्वीर भी फोटोशॉप से बनाई गई थी.
          ऐसे एक नहीं ढेरों उदाहरण मिलेंगे, मैसेज भी ऐसे जो कोई सपने में नहीं सोच सकता. यह फोटो शेयर करें, इसमें बनी मक्खी उड़ जाएगी. कमेंट में 'उठ' टाइप करें और तस्वीर में रेलवे ट्रैक पर लेटी लड़की खड़ी हो जाएगी. बेशक यह बेवकूफाना लगे लेकिन हैरानी होती है जब ऐसी तस्वीरों पर हज़ारों कमेंट और शेयर्स मूर्खता करने वालों की गवाही देते नज़र आते हैं. हमारी यह बेवकूफी कई बार किसी की छवि को धूमिल कर देती है, गलत खबर को लोगों तक पहुंचा देती है. सांप्रदायिक दंगों के रूप में भी ऐसी अफवाहों के दुष्परिणाम सामने  आते रहे हैं.
         बड़ा सवाल है कि हम ऐसा क्यों करते हैं? दोस्त को घंटों समझाने के बाद जब इस बात का जवाब पूछा तो बोले शेयर करने में हमारा क्या जाता है! किसको फुर्सत है जो हर मैसेज की की जांच और तफ्तीश करे.
 सच है, हमारा क्या जाता है! जाता कुछ भी न हो जनाब, तब भी आप उन मूर्खों की लिस्ट में जगह बना लेते हैं जिनमें तर्कशक्ति का अभाव है. क्या सही है और क्या गलत, क्या सच है और क्या झूठ, बिना पूरी बात जाने उसे दूसरों के हवाले करना शायद आपकी नज़र में गलत न हो, लेकिन खतरनाक ज़रूर है.

         अगर आप भी ऐसे मैसेज और तस्वीरों पर पल में यकीन कर इन्हें फॉरवर्ड और शेयर करने वालों में से हैं तो सोशल मीडिया आपके विचारों और सोचने-समझने की  प्रभावित कर रहा है. ज़रूरी है कि अभी संभल जाएं, वरना कल को स्विस बैंक के खाताधारकों की लिस्ट में अगर आपका नाम भी वायरल होने लगे तो मुझसे न कहिएगा. आपका एक मैसेज न फॉरवर्ड करना बड़ा कदम होगा, जो झूठ शायद किसी बड़े दंगे या घटना की वजह  बन सकता था, सिर्फ आपकी वजह से ख़त्म हो जाएगा.

        बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं लगता सच जानने में! अपने मैसेज को ले जाएं और गूगल सर्च के हवाले कर दें, थोड़ी ही देर में उसका सच सामने होगा. अगर आपके पास इतना वक़्त नहीं है, तो बुरा न मानिए लेकिन उसे दूसरों तक पहुंचाने  हक़ नहीं. अब हर कोई आप जितना स्मार्ट नहीं होता न, जो सच और झूठ के भेद को समझ ले. बेहतर होगा अगर अब आप सोशल मीडिया को यूज़ करें न कि वह आपको इस्तेमाल कर रहा हो.

Saturday, 30 April 2016

अधूरा सच, एक वाकया जिसने मुझे एहसास कराया- आँखें हमेशा सच नहीं देखतीं!

आँखें हमेशा सच देखें ये ज़रूरी नहीं! फिल्मों में ऐसा दिखाना ज़रा आसान होता है, आम जिंदगी में ऐसा होगा एक बार को कोई नहीं मानता. रोज़ हमें जाने कितनी ख़बरें देखने को मिलती हैं, और हम एक पल में उनपर यकीन कर लेते हैं. एक वाकया हुआ मेरे साथ और मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि किसी मामले में अपनी राय बनाने में हम ज़रा भी वक़्त नहीं लगाते.

हुआ यूं कि 25 अप्रैल, सोमवार शाम मैं लखनऊ से वापस घर लौट रहा था. मैंने सड़क के किनारे अंगौछा बिछाकर बैठे एक बुजुर्ग को देखा. मुझे लगा शायद कोई भिखारी होगा. मैं घर पहुंचा और थोड़ी देर बाद किसी काम से फिर बाहर निकलना पड़ा. वो बुजुर्ग अब भी वहीँ बैठा था. तभी एक लगभग 40 साल का व्यक्ति वहां आया और उसने बुजुर्ग को पीटना शुरू कर दिया, बेहद गुस्से में दिख रहे उस व्यक्ति ने बुजुर्ग से भीख में मिले पैसे दिखाने को कहा और उसे भगाने लगा.


ये देखकर मुझे बेहद गुस्सा आया. एक बार को मन हुआ कि इसका वीडियो बनाऊं और पुलिस में दे दूं. अंधेरा होने की वजह से ऐसा नहीं कर पाया, लेकिन मुझसे और नहीं सहा गया. आखिर मैंने उससे पूंछा कि वो ऐसा क्यों कर रहा है. बेहद गुस्से में मैंने उसे ऐसा करने से मना किया.

अगले ही पल उसका रोल बदल गया, उस निर्दयी से दिख रहे आदमी की आँखें भर आई और उसने कहा, 'बेटा! ये मेरे बड़े भाई हैं. जाने कब एक रेल हादसे में इनके दोनों पैर कट गए. आठ साल तक ये घर वापस नहीं लौटे. अचानक एक दिन देवां में हाजी वारिस अली शाह की दरगाह  पर गए मेरे गाँव के कुछ लोगों ने इन्हें भीख मांगते हुए देखा. जून 2015 में मैं भी इन्हें ढूँढ़ने दो बार वहां गया और इन्हें घर वापस लाया.

तब से ये मेरे साथ रह रहे हैं, जो हम खाते-पहनते हैं वही इन्हें भी देते हैं. इन्हें घर में बोरियत होती है. तो हमने इन्हें बाहर कुर्सी पर बिठाना शुरू किया, लेकिन ये अपनी आदत से मज़बूर हैं. आज दोपहर में मेरी आँख लग गई और मौक़ा पाते ही ये घर से बाहर निकल आए, भीख मांगने बैठ गए. ऐसे में बेटा आप ही बताओ, मुझपर क्या बीतेगी। सब देखकर यही कहेंगे कि बिचारे को कुछ खाने को नहीं देता, परेशान करता हूँ.

जो इंसान कुछ देर पहले तक क्रूर और निर्दयी लग रहा था, अब आँखों में आंसू लिए बेचारा लग रहा था. मैं कुछ बोलने की हालत में ही नहीं था. वह खुद ये मान रहा था कि बड़े भाई को डांटना या उनपर हाथ उठाना उसे तकलीफ देता है, लेकिन जब भाई ऐसी हरकत करे तो गुस्सा आना वाजिब है.

अब मैं शर्मिन्दा था, मैंने बिना पूरी बात समझे उसे बुरा समझ लिया था. आँखों ने जो देखा उसे सच मान बैठा, क्योंकि भरोसा है इन आँखों पर, जो नज़रों के सामने हो वो झूठ कैसे हो सकता है. आज हमारी आँखें रोज ऐसे अधूरे सच देखती हैं  और उनपर एक पल में यकीन कर लेती हैं. किसको इतनी फुर्सत है कि हर घटना पर रिसर्च करे.

मैं सोच रहा था अगर मैं उस आदमी से बात ही न करता और उसका वीडियो बनाकर शेयर कर देता तो चंद घंटों में उसे सैकड़ों लोग भला-बुरा कह रहे होते, कमेंट्स की बाढ़ आ जाती. जो इंसान सच में अच्छा है उसे बुरा बनने में वक़्त नहीं लगता. रोज हम जाने कितने वायरल वीडियोज़ और फोटोज पर आँखें मूँद कर भरोसा करते हैं और किसी इंसान को बुरा या हीरो मान लेते हैं.

ये घटना मैंने आपसब के साथ सिर्फ इसलिए शेयर की, जिससे अगली बार आप किसी भी फोटो या तस्वीर को देखकर अपनी राय न बनाएं. समझने की कोशिश कीजिये, आपको कितनी  आसानी से बेवकूफ बनाया जा रहा है. तो अगली बार अगर आपको कोई ब्रेकिंग न्यूज़ उड़ती भैंस की दिखे तो सिर्फ वीडियो पर भरोसा न करें, क्योंकि आँखों देखा हमेशा सच हो ये ज़रूरी नहीं!