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Saturday, 14 January 2017

सच और सवाल : रोहिन, नरेन और आईआईएमसी

                25 दिसंबर, 2016। सेमेस्टर एग्जाम ख़त्म होने के बाद मैं घर पहुंचा। फेसबुक खोला तो एक ओपन लेटर शेयर हो रहा था। नरेन सिंह राव नाम के किसी फैकल्टी मेंबर ने अपने आईआईएमसी से निकाले जाने के बाद यह लेटर लिख कर सोशल मीडिया पर सबके हवाले कर दिया था। कई स्टूडेंट उस लेटर को शेयर कर रहे थे और फेयर हियरिंग की मांग कर रहे थे। उनका कहना था कि बिना पहले से बताए किसी को नहीं निकाला जा सकता। https://www.facebook.com/naren.singh (Open Letter)


        कई छात्र शिक्षक तो कई संस्थान के पक्ष में थे और कमेंट्स में उनकी लड़ाई जारी थी। अगले ही दिन दो छात्रों ने उस शिक्षक का कॉन्ट्रेक्ट लेटर फेसबुक पर डालकर मुझे भी टैग किया। इसमें लिखा हुआ था कि नरेन प्रोफ़ेसर नहीं हैं, एकेडमिक एसोसिएट हैं और उन्हें बिना कारण बताए हटाया जा सकता है। कॉन्ट्रेक लेटर उनके हाथ कैसे लगा, इसपर भी कमेंट और फेसबुक पोस्ट्स का संग्राम चलता रहा। 31 दिसंबर को मैं संस्थान में वापस आया और पता चला कि मामला क्या है। 

            ADPR डिपार्टमेंट के एकेडमिक एसोशिएट नरेन सिंह राव को पदमुक्त कर दिया गया। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे इस तरह से दिखाया कि उनको हटाने का कारण विचारधारा और संस्थान में हो रहा भेदभाव है। कई आरोप जड़ दिए(जिनमें से कुछ की जानकारी मुझे है, वह झूठ हैं)। कई छात्र उनको बिना नोटिस दिए निकाले जाने को लेकर सोशल मीडिया पर #istandwithnaren टैग के साथ स्टेटस और तस्वीरें पोस्ट करने लगे।
इस मामले पर कई मीडिया हाउसेज ने लिखा और हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम के मेरे दोस्त रोहिन ने भी इसी मुद्दे पर मीडिया रिपोर्ट तैयार की। जिसे 'न्यूजलांड्री' ने छापा/पोर्टल पर पब्लिश किया। Rohin's Report : academic-associate-sacked-students-put-under-surveillance-all-happening-in-iimc
                            इस बीच यह भी सुनने को मिला कि RTV विभाग के पांच छात्रों को संस्थान के कोड ऑफ़ कंडक्ट का उल्लंघन करने और छवि धूमिल करने की बात कहकर उनसे बात/पूछताछ की गई। यह छात्र निकाले गए शिक्षक का समर्थन करते हुए पोस्ट कर रहे थे। रोहिन को अचानक एक दिन ऑनलाइन मीडिया पर लिखने के कारण निलंबित(सस्पेंड) कर दिया गया। गार्ड्स को उसकी फोटो दी गई और उसके संस्थान में आने पर रोक लगा दी गई। प्रथमदृष्टया यह बात चौंकाने वाली थी और अगले ही दिन संस्थान के डायरेक्टर जनरल केजी सुरेश सर ने क्लास में आकर अपना पक्ष स्पष्ट किया। रोहिन ने अपना सस्पेंशन लेटर सोशल मीडिया पर डाल दिया और ऑनलाइन मीडिया पर लिखने को निलंबन की वजह बताया। इस पूरे मामले को मीडिया में जगह मिलना शुरू हो गई है। अलग-अलग अखबार व न्यूज़ पोर्टल इसपर लिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी घमासान जारी है। विचारधारा से लेकर व्यक्तिगत आक्षेप तक और गालियों तक... 'कुछ भी' पोस्ट हो रहा है। ऐसे कोई समाधान नहीं होता!

          दरअसल, मामले की पूरी जानकारी बहुत कम लोगों को है और जितना आधा-अधूरा पता है, लोग उसके आधार पर निर्णायक की भूमिका में आ रहे हैं। मैं किसी भी एक के समर्थन की स्थिति में नहीं हूं, न ही किसी विचारधारा से पोषित या प्रभावित हूं। IIMC के छात्र के रूप में जो भी देखा और समझा है उसके आधार पर लिख रहा हूं। मुझे हर किसी से कुछ न कुछ कहना है और कुछ सवाल हैं, जो पूरे घटनाक्रम और हर पक्ष को स्पष्ट कर देंगे। मेरी चुप्पी इसीलिए थी जिससे मैं वाकई सच लिख सकूं, विचार नहीं-तर्क लिखूं। सवाल हर किसी से, 

सबसे पहले नरेन सर से सवाल, 
           मैं आपसे कभी नहीं मिला, न आपको देखा है, जितना भी जाना है, इसी मामले के बाद। आपके कई दावे और आरोप झूठे हैं,  जिनकी मुझे जानकारी है उनका ज़िक्र कर रहा हूं। मुझे इसलिए पता है क्योंकि उन आरोपों से जुड़े शख्स मेरे दोस्त और रूममेट हैं। आप मुझे बताइए-

1- आप अपने विरोध में लिखने वालों को ब्लॉक या अनफ्रेंड कर रहे हैं? 
2- ओपन लेटर में लिखी कई बातें झूठी हैं या नहीं? क्या यह माना जाए कि आपका प्रोपोगेंडा झूठ पर आधारित है?
3- आपका मुद्दा सिर्फ इतना था कि आपको बिना बताए निकाल दिया गया। क्या सिर्फ इतना कहकर सामने आना और सवाल उठाना बेहतर नहीं होता?
4- लेटर में आपने जिन दलित कर्मचारियों को निकालने पर सवाल उठाया है, क्या आप वाकई उनके हक में खड़े हुए? कुछ किया?
5- जिस मुस्लिम छात्र (जो अब मेरा रूममेट है) को पीड़ित बताकर आप यह कह रहे थे कि उसके आत्महत्या की नौबत आ गई थी, क्या आपने उससे कभी बात की थी? वह तो आपका नाम तक नहीं जानता था और अपनी एक पोस्ट में यह बताकर आपके इस दावे को झूठा साबित कर चुका है।
6- जिस साइबर हैरेसमेंट केस का ज़िक्र आपने लेटर में किया, क्या आप कभी लड़की से मिले? इस बारे में कभी भी आगे आकर बात की? आवाज़ उठाई? लेटर में आपने लिखा कि यह मामला प्रबंधन के दबाव में  आकर सामने नहीं लाया गया। जबकि शनिवार के दिन जब संस्थान बंद होता है, पूरा स्टाफ आया और इस मामले पर बात की। कार्रवाई हुई और सजा मिली। जब आप इस मामले से जुड़े किसी व्यक्ति से नहीं मिले तो दबाव जैसी बात का ज़िक्र कैसे? अपने मन से?
7- दिल्ली हाईकोर्ट ने आपकी जिस याचिका को खारिज किया है क्या आपने उसमें इन सभी आरोपों का ज़िक्र किया था?  hc-refuses-to-interfere-with-cat-s-order-on-ex-iimc-academic-associate
               सर, ये बातें हवा हवाई नहीं हैं। वाजिब सवाल हैं, जवाब चाहता हूं। फेसबुक पर या आपसे मिलकर। बस, डर है कि जवाब देने कि बजाय अब आप मुझे unfriend न कर दें। इन निराधार आरोपों के बीच आपका मुद्दा किनारे ही रह गया। आप इन झूठे आरोपों को लेकर क्यों आए? सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट करके कौन सा हल निकालना चाहते थे आप? क्या इसलिए कि आपकी बात में दम नहीं था? सर, 
        'राजनीति यहीं से शुरू हुई।'
सवाल मेरे दोस्त रोहिन से, 
             रोहिन, एक प्रभावशाली व्यक्तिव और पढ़ाकू बच्चे की छवि। विषय पर अच्छा ज्ञान, समझदार और अच्छा वक्ता। पत्रकार बनने के सवाल पर तुमने कहा था एकेडमिक्स में जाना है। तुम्हें सस्पेंड कर दिया गया और इससे ज़्यादा चौंकाने वाला कुछ नहीं हो सकता था। इससे भी ज़्यादा यह बात पता चलने पर आश्चर्य हुआ कि गार्ड्स को तुम्हारी तस्वीर देकर तुम्हारे कैम्पस में घुसने पर रोक लगा दी गई है। मैं तुम्हारे साथ था और उसी वक़्त DG सर के पास चलना चाहता था। अगले दिन उनके क्लास में आने के बाद भी बाकी बचे सवाल #सोशल_मीडिया पर नहीं डाले, उनसे पूछकर आया हूं।

                    तुम्हारा अचानक निलंबन गलत है, मानता हूं। सवाल करने चाहिए थे, उसी वक्त। लेकिन निलंबन के बाद तुमने अनुशासन समिति और प्रबंधन से जवाब मिलने से पहले #सोशल_मीडिया की शरण में जाना बेहतर समझा। गलती वहीं हुई दोस्त! वक़्त लेकर समझते तो। सोशल मीडिया लाइक, कमेंट और शेयर देता है। मीडिया फुटेज भी दे सकता है, लेकिन समाधान नहीं। खैर, ये कुछ सवाल- 
1- सबसे बड़ा सवाल, क्या एक बार भी DG केजी सुरेश सर से मिले? सवाल जवाब किए? इस मुद्दे पर बात की? 
2- क्या नरेन सर के ओपन लेटर पर आधारित रिपोर्ट देने से पहले उसमें लगाए गए आरोपों की प्रामाणिकता की जांच की?
3- नए साल पर अपने पोस्ट में तुमने यह नहीं लिखा कि जो छात्र अपने शिक्षक के लिए खड़े हो रहे हैं वहीं बधाई दें? (तुम्हारा पोस्ट- आईआईएमसी के छात्र अपने शिक्षक के लिए खड़े हो रहे हैं. इससे बेहतर साल का अंत और नये की शुरूआत नहीं हो सकती. बाकि, जो 364 दिन जरने वाले जर्नलिस्ट तैयार हो रहे हैं वो हमें नया साल ना ही विश करें तो बेहतर.) 
4- क्या तुमने यह नहीं माना कि जो छात्र निकाले गए शिक्षक का समर्थन नहीं कर रहे, उन्हें 'प्लेसमेंट की चिंता/डर है'? तुमसे यह किसने कह दिया?
5- क्या तुम्हें इस बात का पता था कि नरेन कोर्ट में किन आरोपों के साथ गए हैं? क्या तुमने सोशल मीडिया पर फैले घमासान को रिपोर्ट का आधार नहीं बनाया? 
6- रिपोर्ट में जिस एक शख्स की पोस्ट का ज़िक्र है उसका संस्थान से कोई लेना-देना नहीं? एक फिजूल फेसबूक पोस्ट को रिपोर्ट में जगह देना, सही है? 
7- चलो अगर जगह दी भी, तो DG केजी सुरेश सर को व्यक्ति-विशेष द्वारा दी जा रही गालियों का ज़िक्र भी होना चाहिए था। किया? 
8- क्या वाकई संस्थान ने आपके मेल का जवाब आपको अब तक नहीं दिया है? 
9- किसी अखबार या पोर्टल का यह लिखना कि बिहार के रोहिन को IIMC से निकाला गया, गलत नहीं लगा? आपत्ति दर्ज कराई? इसका आपके बिहार के होने से कोई सम्बन्ध है?
दिल्‍ली में खूब पढ़-लिख रहे थे बिहार के रोहिन, गुस्‍से में IIMC ने सस्‍पेंड ही कर दिया
10- मीडिया चैनलों को लगातार बाइट्स देते जाना और कहना कि मैं सामान्य तरीके से रहना चाहता हूं, अजीब नहीं? आप इनकार कर सकते हैं। 
11- निलंबन के बाद अगर मेल या सवालों का जवाब नहीं मिला? कभी संस्थान आने और प्रबंधन से मिलने का प्रयास किया? जब आपको किसी गार्ड ने रोका हो या ज़बरदस्ती की हो? 
12- निलंबन और निष्कासन में अंतर है न? अनुशासन समिति को अपना पक्ष बताने से पहले सोशल मीडिया पर लाइव और मीडिया चैनलों को पक्ष बताना आपके विवेक के अनुसार सही है? 
               खैर, बस कुछ सवाल थे। बाकियों की तरह सुझाव नहीं दूंगा, आप खुद ही समझदार हैं। बिना किसी मतभेद/मनभेद के मुझे और अपने अन्य साथियों को भी unfriend कर दिया है। अब तुम्हें लाइव कैसे देखूं?
students-allege-surveillance-at-iimc-after-one-is-suspended-for-critical-piece-on-institute

सवाल प्रबंधन/DG केजी सुरेश सर से,
               आईआईएमसी के नए डीजी सर ने कई बदलाव किए। शुरुआत से ही संस्थान की बेहतरी के लिए काम करते दिखे। कभी भी किसी छात्र को ऑफिस आकर खुदसे मिलने से नहीं रोका। छह महीने के उर्दू पत्रकारिता के सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम को डिप्लोमा पाठ्यक्रम बनवाया। लेकिन रोहिन के निलंबन ने मुझे वाकई चौंका दिया। अचानक, बिना पूर्व चेतावनी उसे निलंबित करना। आपसे सवाल करने ही थे तो अकेले ही ऑफिस पहुंच गया। आप ही हैं जो सोशल मीडिया पर ट्रॉल और जवाब नहीं देते, ऑफिस हमेशा खुला रहता है। सुबह 11 बजे से देर रात तक।
आपसे सवाल और जवाब-

1- क्या रोहिन को जल्दबाज़ी में निकाला गया था? 
उत्तर- नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। उसने न्यूज़ पोर्टल के लिए रिपोर्ट तैयार की और वो भी एकतरफ़ा। सोशल मीडिया पर लिखना अलग बात होती है, उसने न्यूज लिखी जिसमें झूठे आरोप दोहराए गए। 
2- क्या रोहिन इस मामले को लेकर आपसे कभी मिला?
उत्तर- वो तो मुझसे मिला ही नहीं। मुझे तो ख़ुशी होती अगर वो एक बार भी अपनी बात लेकर आता। एक बार भी वह मुझसे मिलने नहीं आया। 
3- क्या रोहिन की मेल का जवाब नहीं दिया गया? 
उत्तर- बिलकुल दिया गया है। उससे कहा गया है कि अनुशासन समिति के सामने आकर अपना पक्ष रखे। (रोहिन के सवाल और उसके दिए गए जवाब दोनों मेल की कॉपी मुझे दी है, जिसे आखिरी में अटैच कर रहा हूं।)*
4 - सर! निकाले गए नरेन राव सर का कॉन्ट्रेक्ट लेटर कुछ बच्चों ने पोस्ट किया? वह लेटर उनके हाथ कैसे लगा? https://www.facebook.com/photo.php (contract letter)
उत्तर- हमने तो नहीं दिया। लेकिन आजकल डॉक्युमेंट्स का फोटो खींचकर व्हाट्सएप पर डालना इतना आसान हो गया है कि पता ही नहीं लगता। कब आपकी बात को कोई रिकॉर्ड कर रहा हो, पता ही नहीं चलता। 
5- रोहिन को सीधा सस्पेंड करने की वजह क्या रही?
उत्तर- कोई भी अनुशासनहीनता करेगा तो उसे सजा मिलेगी। अगर आप गलती पर गलती करेंगे तो अनुशासन समिति को मामला सौंपना विकल्प होगा। निलंबन कोई सजा नहीं है, आपको समिति के सामने अपना पक्ष रखना है। पिछले मामलों में निलंबित छात्र भी संस्थान में वापस आ चुका है और क्लासेज कर रहा है। 
6- सर! क्या न्यायालय में विचाराधीन मामले पर रिपोर्टिंग नहीं हो सकती? 
उत्तर- ऐसा नहीं कहा मैंने! होती है, लेकिन उसका आधार वही तथ्य होते हैं जो न्यायालय के सामने रखे गए हों। उसके बाहर या सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोप नहीं। 
                    बाकी सर क्लास में अपना पक्ष स्पष्ट कर चुके थे। आरोपों से इतर इस बात में कोई दो राय नहीं कि संस्थान में छात्रों को बेहतर करने और सीखने के मौके दिए जा रहे हैं और DG सर की गाड़ी सबसे ज़्यादा देर से वापस जाती है। संस्थान में भेदभाव और जातिवाद? नहीं! कभी भी किसी ने मेरी जाति और पृष्ठभूमि के आधार पर मुझे कोई मौका नहीं दिया। कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ है। जिसने गलती की, उसे सजा मिली है।

मेरी बात : 
                   मैं गलत हो सकता हूं, हर कोई हमेशा सही हो यह ज़रूरी तो नहीं। गलत रोहिन भी हो सकता है, संस्थान भी और नरेन भी। इस सब के पीछे जो भी सामने आया वो है, सोशल मीडिया का घमासान। आईआईएमसी में हालात बुरे हैं? भेदभाव है? वाकई? नहीं है मेरे दोस्त। इस बात से इनकार कर सकते हो लेकिन खुद से झूठ नहीं बोल सकते। अहम् से बढ़कर भी बहुत कुछ है। अगर संस्थान से जुड़ी समस्या रही हो, तो क्यों न प्रबंधन से उसपर बात की जाए। सुधार ज़रूरी हो तो प्रबंधन के साथ मिलकर किया जा सकता है, सोशल मीडिया पर बताकर नहीं। अभी बेवजह झूठी बुनियाद पर संस्थान की छवि खराब नहीं होने दो। दोस्त जो बात तुम फेसबुक पर लाइव कहते हो, हाथ जोड़कर कहते हो कि मुझे पढ़ने दीजिए, चलो न डीजी सर से या डिसिप्लिनरी कमिटी से कहकर देखो। अपराधी नहीं हो तुम, हम साथ चलेंगे। प्रबंधन में भी किसी का तुमसे व्यक्तिगत मनमुटाव नहीं है। तुम योग्य हो तभी यहां हो। अड़ो मत और गलतियां मत करते जाओ।
                    शेष, इस पोस्ट का आधार मेरे सामने हुआ पूरा घटनाक्रम है, और यह तथ्य आधारित है। मैं किसी भी एक पक्ष के लिए नहीं लिख रहा हूं। रोहिन का निलंबन या नरेन सर का निष्कासन सही है, ऐसा में एक बार भी नहीं कहता। कुछ छुपे तथ्यों का स्पष्ट होना ज़रूरी था, इस पोस्ट के माध्यम से मैंने यही कोशिश की है। यह पोस्ट लिखना मेरा अपना विचार था और इसपर किसी तरह की विचारधारा, राजनीति या व्यक्ति-विशेष का कोई प्रभाव नहीं है।

*रोहिन के सवाल और उसके दिए गए जवाब दोनों मेल की कॉपी  


रोहिन का मेल/सवाल 

संस्थान का रिप्लाई/जवाब-1 
  
संस्थान का रिप्लाई/जवाब-2 

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http://www.dnaindia.com/delhi/report-iimc-suspends-student-for-writing-about-sacked-faculty-2291628

http://www.thehindu.com/news/cities/Delhi/IIMC-student-suspended-for-post-backing-sacked-teacher/article17025023.ece

https://www.scoopwhoop.com/Why-This-Journalism-Student-Was-Suspended-By-Indian-Institute-For-Mass-Com-For-Writing-A-Report/#.pkyy404fl

http://www.bhadas4media.com/article-comment/11684-rohin-verma-iimc-suspend

http://hindi.oneindia.com/news/delhi/iimc-student-rohin-verma-suspended-for-writing-online-394703.html

Thursday, 5 January 2017

लड़की मैं हूं! लेकिन अब डरना तुम्हें चाहिए...


                        पापा मुझे बाहर कम जाने देते हैं, रात में जल्दी घर आने को कहते हैं, पार्टी करने की छूट नहीं देते, अनजान लोगों से बात करने से मना करते हैं। क्या वो मुझसे प्यार नहीं करते? वो बुरे हैं, ओपन माइंडेड नहीं हैं? नहीं! वो बहुत अच्छे हैं, मुझे आगे बढ़ने देना चाहते हैं, उड़ते हुए देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें रोकटोक करनी पड़ती है। पता है क्यों! तुम्हारी वजह से। सही सुना, तुम्हारी वजह से। 
                 उन्हें पता है, मैं सूट पहनकर निकलूं, टॉप पहनूं या फिर हिज़ाब... तुम्हारी तिरछी और बेशर्म नज़रें मेरी माप लेना चाहेंगी, झांकना चाहेंगी मेरे कपड़ों के अंदर, नज़रों से आगे बढ़कर छूना भी चाहोगे मुझे, क्यों? लड़की हूं इसलिए! 
हर तरफ, हर जगह, हर वक़्त तुम्हारी बेशर्मी दिखती है। क्या मुझे डरना चाहिए? झूठ नहीं बोलूंगी, डर लगता है। जितना गुस्सा आता है उससे ज़्यादा डर लगता है। कह सकती हूं कि कमज़ोर नहीं हूं, आज़ाद हूं, निडर हूं। लेकिन मुझपर लगने वाली पाबंदियों की वजह भी अपनों का यही डर है। 
                क्या मुझे इसलिए डर लगता है कि मैं लड़की हूं? नहीं! बेशर्म... डर इसलिए लगता है क्योंकि तुम इंसान नहीं रहे। पड़ोस में रहने वाले अंकल से लेकर मुझे फेसबुक पर मैसेज करने वाले अनजान शख्स तक, सब छूना चाहते हैं मुझे, खा जाना चाहते हैं। इंसान नहीं रहे हो तुम अब। हवस, बेशर्मी और अश्लीलता तुममें इस कदर भर चुकी है कि शायद अपनी मां के सूखते कपड़े देखकर भी तुम्हारा मन मचल जाता हो। मानसिकता को दोष नहीं देना, तुम भी पल्ला झाड़ लोगे। मानसिकता तुम्हें नहीं, तुम उसे वाहियात बनाते हो। चार महीने की बच्ची से लेकर 84 साल तक की बुज़ुर्ग तक सबमें तुम्हें दिखते हैं अंग। नहीं दिखती ज़िंदगी, नहीं दिखता एक मन। बस टूट पड़ना है तुम्हें, नोच लेना है मुझे। 

               कभी महसूस किया है ये डर। जब कोई बिना तुम्हारी मर्ज़ी के तुम्हें छुए, मसल जाए। सिर्फ तुम्हारा शरीर ही नहीं, मन भी दर्द से चीख उठता है। खुदसे नफरत होने लगती है, हज़ार बार धुलती हूं लेकिन वो घिनौना एहसास नहीं धुलता। शर्म नहीं आती तुम्हें, इंसान जो नहीं हो। मुंह पर शराफत का मुखौटा लगाए तुम्हें भी बस मौके की तलाश है। मैंने कुछ नहीं किया, तो पूरा बोलो न! मौका मिलेगा तो चूकूंगा नहीं। 
                 अब वक़्त तुम्हारे डरने का है। तुम्हें किसी मर्द ने नहीं जना, किसी मर्द से शादी नहीं हुई है, कोई मर्द राखी नहीं बांधता। कैसे यकीन दिलाओगे खुदको। जब तुम्हारी बेटी स्कूल जाएगी, तो तुम्हारे जैसा घिनौना टीचर खेल के नाम पर उसके कपड़ों में हाथ नहीं डालेगा। जब शाम को मां बाजार जाएगी तो उसे तुम जैसे भेड़िए दबोच नहीं लेंगे। भैया कोचिंग जा रही हूं बोलकर जाने वाली बहन को तुम्हारे जैसा हैवान गाड़ी में नहीं खींच लेगा। हर कोई तुम जैसा ही दरिंदा है अब, किस-किस से बचाओगे। अब तो डरना शुरू कर दो। 
                 ओह! तो तुम भी पाबंदियां लगा दोगे। बहन अकेले बाहर नहीं जाएगी, बेटी को पढ़ने और मां को बाजार नहीं भेजोगे। अच्छा, मर्यादा के नाम पर कितना जकड़ोगे मुझे। खुद मर्यादा का मतलब समझ सकते, तो बेहतर होता। जंज़ीरों में जकड़ा है न मुझे। अब सब ठीक रहेगा। रात में क्यों निकली, तो क्या दिन में बलात्कार नहीं होते? छोटे कपड़े क्यों पहने, तो हिज़ाब पहने लड़कियों को कोई नहीं घूरता? जवान लड़की बाहर क्यों निकली, बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं का रेप नहीं होता? 
                  बेवकूफ! तुम्हारी तर्कशक्ति मर चुकी है। पागल हो चुके हो तुम। मेरी ज़रुरत है न तुम्हें? अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए। तो मुझे ज़िंदा तो रखना पड़ेगा, बचाकर रखना पड़ेगा। अरे मुझे बचाने वाले भी तुम हो और नोचने वाले भी। पाबन्दी की ज़ंजीरें और कसते जाओगे। इसी डर की वजह से, जो तुमने पैदा किया है। अगर यूं ही कसती जाएंगी पाबन्दी की ज़ंजीरें तो मर जाऊंगी मैं, लेकिन मुझसे पहले तुम मरोगे। कमसे कम इस डर से तो डरो। मुझे मत बचाओ, खुद को बचाओ। वरना आओ, खा लो मुझे, नोच लो। मुझे मारो और तुम भी बदतर मौत मरो।

Sunday, 10 July 2016

हमारी सोच पर हावी होता सोशल मीडिया

           हमारे एक पुराने मित्र मिलते ही बिफर पड़े, 'कैसे पत्रकार हो भाई आप! स्विस बैंक में खाताधारकों के नाम पब्लिक हो गए और आपको खबर तक नहीं!' उनका दावा और गुस्सा देख एक पल को हम भी भौचक्के रह गए. इतनी बड़ी बात हो गयी और मुझे पता कैसे नहीं चला, मेरे तो पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. इससे पहले कि मैं उनसे कुछ पूछता, गुस्से में मुट्ठियां भींचते उन्होंने मेरी सारी आशंकाओं पर विराम लगा दिया. बोले,'व्हाट्सएप वगैरह चलाते हो कि नहीं? तुम मीडिया वालों ने तो पैसा खा रखा है, तुम क्यों सच बताओगे.'


हां, सही तो है. हम क्यों सच बताने लगे, सच बताने और हर छुपी बात सामने लाने का ठेका तो व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर पर आपके हितैषियों ने ले रखा है. जो कभी स्विस बैंक के खाताधारकों में पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को शामिल कर देते हैं तो कभी हेलन की फोटोशॉप तस्वीर को कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी की जवानी से जोड़ देते हैं. इतना ही नहीं ये हितैषी ही आपको ऐसा मैसेज भेज सकते हैं, जिसे तीन ग्रुप्स में फॉरवर्ड करते ही आपका फ़ोन 100 प्रतिशत चार्ज हो जायेगा, या फिर आपको 5 जीबी डेटा फ्री मिलेगा. हमारे बस में तो इतना सब नहीं है.
          बेशक आप समझ चुके होंगे मेरा इशारा किस तरफ है! यूं तो सोशल मीडिया संचार क्षेत्र में क्रान्ति लेकर आया है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसका उपयोग अफवाहों को फैलाने और झूठा प्रचार करने के लिए बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. यही नहीं, इससे जुड़े कुछ उदहारण शायद आपको बेवकूफाना लगें लेकिन करोड़ों लोग जानबूझकर ऐसी बेवकूफियां करते हैं और दूसरों को भी अपने कुटुंब में शामिल करना चाहते हैं.
         सिर्फ एक मैसेज और मेरे दोस्तों ने कुरकुरे खाना काम कर दिया, फ्रूटी पीनी छोड़ दी. इस मैसेज में कहा गया था कि कुरकुरे में प्लास्टिक है, सबूत पेश हुआ कि आप चाहें तो इसे जलकर देख लें, ये प्लास्टिक की तरह जलता है. और तो और कहा गया कि फ्रूटी की फैक्ट्री में कुछ एचआईवी पॉजिटिव वर्कर्स ने अपना खून फ्रूटी में मिला दिया है, तो सावधान आपको भी एचआईवी हो सकता है. सच तो यह है कि कुछ भी खाने-पीने से एड्स का वायरस नहीं फैलता, कुरकुरे भी प्लास्टिक नहीं स्टार्च की वजह से अलग तरह से जलता दिखता है. इन ख़बरों का सच से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन बड़े तबके ने इन पर विश्वास कर लिया. सिर्फ निरक्षर और पिछड़ा वर्ग ही नहीं, मॉडर्न सोसाइटी के पढ़े लिखे लोगों ने भी इस पर यकीन किया. 
           एक और बड़ी खबर व्हाट्सएप, फेसबुक सोशल मीडिया के ज़रिये तेजी से फैली, इसमें कहा गया कि राष्ट्रगान 'जन गण मन' को यूनेस्को ने बेस्ट राष्ट्रगान का खिताब दिया है. खबर फैलने की देरी थी कि बधाइयों का दौर शुरू हो गया. भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने ट्विटर पर बधाई भी दे डाली. बाद में यह खबर भी झूठ निकली. कुछ इसी तरह एक तस्वीर शेयर की जाने लगी जिसे नासा द्वारा दीवाली पर्व के वक़्त ली गई भारत की तस्वीर बताया जाने लगा. लोग धड़ाधड़ शेयर करते गए और मूर्ख बनते गए. जबकि इसका सच  तक कोई वास्ता नहीं था. ये तस्वीर भी फोटोशॉप से बनाई गई थी.
          ऐसे एक नहीं ढेरों उदाहरण मिलेंगे, मैसेज भी ऐसे जो कोई सपने में नहीं सोच सकता. यह फोटो शेयर करें, इसमें बनी मक्खी उड़ जाएगी. कमेंट में 'उठ' टाइप करें और तस्वीर में रेलवे ट्रैक पर लेटी लड़की खड़ी हो जाएगी. बेशक यह बेवकूफाना लगे लेकिन हैरानी होती है जब ऐसी तस्वीरों पर हज़ारों कमेंट और शेयर्स मूर्खता करने वालों की गवाही देते नज़र आते हैं. हमारी यह बेवकूफी कई बार किसी की छवि को धूमिल कर देती है, गलत खबर को लोगों तक पहुंचा देती है. सांप्रदायिक दंगों के रूप में भी ऐसी अफवाहों के दुष्परिणाम सामने  आते रहे हैं.
         बड़ा सवाल है कि हम ऐसा क्यों करते हैं? दोस्त को घंटों समझाने के बाद जब इस बात का जवाब पूछा तो बोले शेयर करने में हमारा क्या जाता है! किसको फुर्सत है जो हर मैसेज की की जांच और तफ्तीश करे.
 सच है, हमारा क्या जाता है! जाता कुछ भी न हो जनाब, तब भी आप उन मूर्खों की लिस्ट में जगह बना लेते हैं जिनमें तर्कशक्ति का अभाव है. क्या सही है और क्या गलत, क्या सच है और क्या झूठ, बिना पूरी बात जाने उसे दूसरों के हवाले करना शायद आपकी नज़र में गलत न हो, लेकिन खतरनाक ज़रूर है.

         अगर आप भी ऐसे मैसेज और तस्वीरों पर पल में यकीन कर इन्हें फॉरवर्ड और शेयर करने वालों में से हैं तो सोशल मीडिया आपके विचारों और सोचने-समझने की  प्रभावित कर रहा है. ज़रूरी है कि अभी संभल जाएं, वरना कल को स्विस बैंक के खाताधारकों की लिस्ट में अगर आपका नाम भी वायरल होने लगे तो मुझसे न कहिएगा. आपका एक मैसेज न फॉरवर्ड करना बड़ा कदम होगा, जो झूठ शायद किसी बड़े दंगे या घटना की वजह  बन सकता था, सिर्फ आपकी वजह से ख़त्म हो जाएगा.

        बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं लगता सच जानने में! अपने मैसेज को ले जाएं और गूगल सर्च के हवाले कर दें, थोड़ी ही देर में उसका सच सामने होगा. अगर आपके पास इतना वक़्त नहीं है, तो बुरा न मानिए लेकिन उसे दूसरों तक पहुंचाने  हक़ नहीं. अब हर कोई आप जितना स्मार्ट नहीं होता न, जो सच और झूठ के भेद को समझ ले. बेहतर होगा अगर अब आप सोशल मीडिया को यूज़ करें न कि वह आपको इस्तेमाल कर रहा हो.

Tuesday, 8 March 2016

अबला नारी नहीं सब पर भारी है आज की महिला!

        मैं आज की नारी हूँ। जिस नारी का स्वरूप इस पुरुषप्रधान समाज ने हमेशा से ही कमजोर व बेबस बनाते हुए हमें अबला नाम दिया था, आज वही समाज हमारी सफलता को चुनौती मानकर घबराया हुआ है। हम पर हमेशा बन्दिशें लगती रहीं, सीमाओं और मर्यादा के दायरे में हमें हमेशा से ही बांधा गया। इसके बावजूद हम बढ़ते रहे, एहसास दिलाते रहे कि आप अकेले नहीं हैं। हमने आपको कभी नीचा नहीं दिखाया, चुनौती नहीं दी। हमें तो सिर्फ अपना हक़ चाहिए, आप हमें रोकने की लाख कोशिशें कर लें, अपने अधिकार हम लेकर रहेंगे।

हमारी कहानी हमेशा दुख भरे शब्दों में बयां की जाती है। हमारी छवि समाज में पीड़ित, दुखी और बेचारी महिला वाली बनाकर प्रस्तुत की जाती है। सच तो ये है, अब मैं अबला नहीं रही। मुझे पता है कि मुझे अपने अधिकारों की लड़ाई किस तरह लड़नी है और कैसे कंधे से कंधा मिलाकर चलना है। हमें आगे बढ़ता देख पहले रीति रिवाजों और रूढ़ियों की ज़ंजीरों से बांधने की कोशिश की गई और जब ये ज़ंजीरें भी हमें बांध न सकीं तो सामाजिक मर्यादाओं और सीमाओं का हवाला दिया गया। हम पर एक के बाद एक दबाव डाले गए। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस दबाव ने हमें कमजोर बनाने के बजाय और मजबूत कर दिया। बढ़ते सामाजिक दबाव के साथ हमारी शख्सियत दिनों दिन निखरती गई।

आज मैं ऑफिस और घर दोनों की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाने में सक्षम हूँ, एक अच्छी माँ हूँ, जिम्मेदार पत्नी हूँ और कुशल गृहिणी भी हूँ। मुझे नहीं अच्छा लगता जब महिलाओं को बेचारी या कमजोर कहते हुए लेख लिखे जाते हैं। अपने हक़ की लड़ाई लड़ने को तैयार अब मैं मजबूर या कमजोर नहीं। मैं किसी की गुलाम नहीं।

देश में महिला साक्षरता दर बढ़ रही है क्योंकि अब तक सिर्फ सपने देखने वाली महिलाएं हर सपना पूरा करने का मन बना चुकी है। हमारे सपने अब एक अच्छे जीवनसाथी और अच्छे ससुराल तक ही सीमित नहीं रहे, अब मैं एयरहोस्टेस बन आसमान में उड़ने के सपने देखती हूँ तो कल्पना चावला की तरह अन्तरिक्ष में तैरने के! इतना ही नहीं देश के विकास में हमारा प्रतिशत पुरुषों से कुछ कम नहीं है। आम धारणा से उलट भारत में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत अपेक्षाकृत ज़्यादा है। महिलाओं की भागीदारी कृषि में जहां 55% से 66% है वहीं डेयरी उद्योग में तो 94% हिस्सा महिलाओं का है। यही वजह है कि हमारे अधिकार भी बढ़े हैं।

मैं इस बात से इनकार नहीं करती कि आज भी हम कई समस्याओं और हमारे खिलाफ बढ़ते अपराधों से घिरे हैं, लेकिन इसका मतलब यह कहीं से नहीं कि हमें कमजोर समझने के भूल की जाए। यह सब ज़्यादा दिन तक नहीं चलने वाला, बहती हुई नदी और सुबह की धूप की तरह आगे बढ़ रही हूँ मैं। हमारा आगे बढ़ना जो समाज के लिए खुशी की बात है उसे लेकर पुरुष वर्ग घबराया और बौखलाया सा दिख रहा है। यूं तो आज की नारी को किसी की स्वीकृति की ज़रूरत नहीं, लेकिन बेहतर होगा अगर समाज हमारी पूर्णता को स्वीकार करे, अबला नारी वाले दबे कुचले नहीं बल्कि अष्टभुजी माँ दुर्गा वाले स्वरूप को स्वीकार करे। 

Thursday, 3 March 2016

पैरों में पहना जाता हूं!

कभी पैरों में पड़ा तो कभी घर के कोने में; मैं जूता हूं। जाने क्यों लोग मुझे इतना गिरा हुआ समझते हैं? कहते हैं तुम्हे तो मैं पैरों की जूती भी न बना । आखिर क्या ग़लती है मेरी? धूल ; पत्थर और कांटो से भरे रास्तों में तुम्हारे पैरों को बचाता हूं; खुद उफ भी नहीं करता जाने क्या क्या सह जाता हूं।
मुझे पाॅलिश करने का वक्त भी नहीं होता तुम्हारे पास। क्या तुम्हें पता है, बाहर बैठे बूट पाॅलिश वाले राजू को एक वक्त की रोटी मैं ही दिलाता हूं। इतना छोटा भी मत समझो मुझे, बड़े बड़े लोगों को फेंककर मारा जाता हूं। जब भी किसी के सिर पर पड़ता हूं, तो सिर्फ दर्द ही नहीं देता, उसका सम्मान भी ले जाता हूं।

कुछ भी हो जूता हूं, पैरों में पहना जाता हूं। दर दर की ठोकरें खाता हूं, घिसता हूं, फट जाता हूं और कबाड़ में फेंक दिया जाता हूं। जाने क्यों मैं गिरा हुआ समझा जाता हूं?
               लेकिन मेरी अहमियत तो उस दिन समझ आती है, जब मैं मन्दिर से चोरी हो जाता हूं। जब तुम नंगे पांव घर आते हो, तो मैं बहुत याद आता हूं। पर क्या करुं? जूता हूं पैरों में पहना जाता हूं।

Thursday, 16 April 2015

सशक्त हूँ क्योंकि महिला हूँ

                    भारत देश के विकास में महिलाओं का हमेशा से ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वर्तमान परिपेक्ष्य में लोकसभा स्पीकर के रूप में दूसरी महिला सुमित्रा महाजन, अंतरिक्ष मे उड़ान भरती सुनीता विलियम्स, बैडमिंटन में साइना नेहवाल तो टेनिस में सानिया मिर्ज़ा, उद्योग के क्षेत्र में पहचान बना चुकी इन्दिरा नूई हों या चंदा कोचर, अगर हम इन प्रभावशाली महिलाओं की बात करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत मे महिलाओं कि स्थिति में पहले से काफी सुधार आया है। आज महिलाओं को हर क्षेत्र मे आजादी और समता दी गयी है। चाहे रोजगार की बात हो या शादी की, अब महिलाएं अपनी पसंद का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र हैं। एक वक़्त अबला कही जाने वाली नारी अब कमजोर नहीं रही, असोम जैसे पिछड़े क्षेत्र से बॉक्सिंग में ओलंपिक पदक लाने वाली मैरीकॉम इसका उदाहरण हैं। समाज के लगभग हर तबके में अब महिलाओं को समान अधिकार दिये जाने की बात की जा रही है, साथ ही महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा महिलाओं के लिए बाल विकास योजना, सूचना किशोरी शक्ति योजना और किशोरियों के लिए पोषण कार्यक्रम जैसी कितनी ही योजनाएँ चलायी जा रही हैं। एक वक़्त था जब महिलाओं का काम घर मे रहकर सिर्फ चूल्हा बर्तन करना ही था, जबकि आज वो पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलकर चल रही हैं। कभी चहारदीवारी के अंदर पर्दे में रहने वाली महिलाएं आज पुरुषों को चुनौती देकर अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रही हैं। हर वर्ष आने वाले प्रतियोगी परीक्षाओं के नतीजें हों या फिर उद्योग के क्षेत्र मे बड़े नाम, महिलाओं ने हर क्षेत्र में बाज़ी मारी है।
         
 लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि महिलाओं की ये चुनौती पुरुष वर्ग को गवारा नहीं है। महिलाओं के योग्य प्रबंधन को पुरुष अपने लिए घातक मान बैठे हैं। महिलाओं का उनसे अधिक योग्य होना और ऊंचे पदों पर बैठना पुरुषों के लिए अपमानजनक साबित हो रहा है। महिला सशक्तीकरण के मुद्दे पर की जाने वाली बातों की एक बानगी देखिये, एक ओर तो महिलाओं को देवी मानकर पूजा जाता है और दूसरी ओर महिलाओं के साथ अपराधों में भी बढ़ोत्तरी हुई है। आज के समय मे भी लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर मात्र 921 महिलाओं का है। इससे स्पष्ट होता है कि भ्रूण हत्या जैसे घिनौने अपराध आज भी जारी हैं, पिछले गणतन्त्र दिवस पर प्रधानमंत्री कि भ्रूण हत्या रोकने कि अपील को एक बड़े कदम के रूप मे देखा जा रहा है। सरकार का बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ मिशन भी ज़ोरों पर है, लेकिन आंकड़ो पर नज़र डालें तो वर्तमान समय में महिला और पुरुषों की साक्षरता दर में पूरे बीस प्रतिशत का अंतर देखने को मिलता है। भारत में हर 34वें मिनट एक महिला रेप का शिकार होती है, हर 42वें मिनट यौन उत्पीड़न का दंश झेलती है, हर 43वें मिनट एक महिला का अपहरण होता है, हर 93 मिनट में एक महिला की हत्या कर दी जाती है और हर 103वें मिनट एक महिला दहेज के नाम पर बलि चढ़ा दी जाती है। 1993 से 2010 के बीच महिला अपराधों में आश्चर्यजनक रूप से 150 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। इसका कारण है कि महिलाओं को मिल रही स्वतन्त्रता को पुरुष वर्ग हजम नहीं कर पा रहा। कई बार इसके लिए भी महिलाओं को दोषी ठहरा दिया जाता है और उन्हे संभलकर रहने की सलाह दी जाती है। कागज़ पर चलाई जा रहे जागरूकता कार्यक्रमों को आईना दिखने के लिए ये आंकड़े पर्याप्त हैं। अब आवश्यकता है इन योजनाओं को कागजों से उतारकर जमीनी हक़ीक़त मे बदलने की।
    पुरुषप्रधान समाज में महिलाओं को मिल रही आज़ादी को सामाजिक मर्यादाओं के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। जहां महानगरों में रहने वाली महिलाएं अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं, वही ग्रामीण परिवेश अब भी बेटी को पराया धन और बोझ मानकर चल रहा है। खाप पंचायत के महिलाओं को मोबाइल न देने और जीन्स पहनने की मनाही को लेकर किए गए फैसले पुरुष प्रधान समाज की संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि अविवाहित महिलाओं के पास मोबाइल मिलने पर पाँच हज़ार तो विवाहित महिलाओं को दो हज़ार जुर्माना भरना होगा। ये अनावश्यक प्रतिबंध स्पष्ट करते है कि पुरुषों का एक बड़ा तबका महिलाओं को मिल रही वैचारिक आज़ादी से बौखलाया हुआ है। उन्हें अपने अस्तित्व पर खतरा मंडराता दिख रहा है। मर्यादाओं और रूढ़ियों के नाम पर महिलाओं को हमेशा से ही दबाकर रखने वाला यह तबका आज सामाजिक कुरीतियों कि पैरवी कर रहा है और महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों के लिए भी उन्हें ही जिम्मेदार ठहरा रहा है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी महिलाएं आवाज़ उठा रही हैं और अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं। बात चाहे नोबल पुरस्कार विजेता मलाला युसुफ़जई की हो या अफगानिस्तान की पहली टैक्सी ड्राईवर सारा बहाई की, इन महिलाओं ने ना सिर्फ आवाज़ उठाई बल्कि खुद को साबित भी किया। प्रिया झींगन, अंजलि गुप्ता और पुनीता अरोरा जैसी महिलाओं ने भारतीय सेना में भी महिलाओं की दावेदारी पेश की और साबित किया कि शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर समझी जाने वाली महिलाएं भी दुश्मन को बराबर कि टक्कर देने का माद्दा रखती हैं। महिलाओं की आवाज़ को दबाने की सभी  कोशिशें नाकाम हुई हैं क्योंकि आज की महिलाएं अपने अधिकारों के लिए लड़ना जानती हैं, वो ना सिर्फ स्वयं जागरूक हैं साथ ही दूसरी महिलाओं को भी जागरूक कर रही हैं। ये कहना ज़रा भी गलत ना होगा कि महिला सशक्तीकरण के लिए किए जाने वाले कामों और अभियानों कि कागजी और जमीनी सच्चाई में ज़मीन आसमान का अंतर है। ग्रामीण परिवेश में रहने वाली महिलाओं को सही मायनों में जागरूक करने कि आवश्यकता है, क्योंकि वो आज भी अपने अधिकारों से अनजान हैं और अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को सहने को विवश हैं। यदि इन क्षेत्रों में महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा दिया जाये तो दहेज, घरेलू हिंसा और महिला उत्पीड़न जैसे अपराधों पर अंकुश लगाया जा सकता है। महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार जैसे अपराध पुरुष वर्ग की विकृत मानसिकता के परिचायक हैं, जिन्हें रोकने के लिए सामाजिक सुधार जरूरी है।
    सकारात्मक पहलू की बात करें तो आज के युवाओं में लिंगभेद जैसी कोई भावना नहीं है। गैरजिम्मेदार समझे जाने वाले युवाओं को अपनी ज़िम्मेदारी का पूरा एहसास है, वो एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना जानते है। आज का युवा लड़के और लड़की मे भेदभाव नहीं करता, उसे मालूम है कि महिला और पुरुष एक ही गाड़ी के दो पहियों की तरह हैं और इन दोनों का साथ चलना जरूरी है। परिवार मे जितना महत्व पुरुष का है उतना ही स्त्री का भी क्योंकि कहा जाता है की नारी घर की लक्ष्मी होती है। आज की लक्ष्मी तो घर और ऑफिस दोनों संभालने में सक्षम है, इसलिए उसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। मर्यादाओं और संस्कृति के नाम पर महिलाओं के अधिकारों का हनन करने वाले समाज के ठेकेदारों को सोच लेना चाहिए कि आज का युवा किसी की बातों में आकर अपना अहित करने वालों मे से नहीं है, उसे सही और गलत का भान है और पता है कि उसे क्या करना चाहिए। राजधानी दिल्ली में हुए निर्मम दामिनी हत्याकांड के बाद युवाओं का आक्रोश पूरे विश्व के लिए सुर्खियां बना था। उस अपार आंदोलन मे ना तो कोई नेतृत्व था और ना ही कोई रणनीति, थे तो केवल युवा। जहां सोशल मीडिया एक मंच बना और दिल्ली रण। युवाओं ने जता दिया कि महिला सुरक्षा के मुद्दे पर सभी एकजुट हैं और आनन फानन में महिला सुरक्षा संबंधी नए कानून बना दिये गए। महिलाओं के पास सबसे बड़ा हथियार है सोशल मीडिया और नए संचार माध्यम, इनकी सहायता से वो अपनी सफलता के रास्ते मे आने वाली हर रुकावट से उबरकर खुद को साबित कर सकती हैं। अच्छी बात यह भी है कि अब महिलाओं को किसी के सहारे की जरूरत नहीं होती, वो खुद दूसरों का सहारा बनने का दम रखती हैं।    
कल एक महिला को कहते सुना, लोग हमें ही दोष देते हैं, लेकिन दोष हममें नहीं उनकी मानसिकता में है। मुझमें कोई कमी नहीं, कमी उन सबमें है जो मुझे दोष देकर अपने दामन को साफ बताते हैं। मैं सशक्त हूँ क्योंकि महिला हूँ। सुधारना है तो खुदको सुधारो और अपनी मानसिकता बदलो। यही तो है वो भारत देश जहां कहते हैं- 
                            यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता।