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Monday, 7 January 2019

मोईजी का इंटरव्यू: व्यंग्य

         हिंट तो मोईजी ने इंटरव्यू में दे दिया था, मैं ही समझ नहीं पाया। आज फिर उनसे किए सवाल और उनके जवाब याद आ गए। तीन महीने पहले पीएमओ ने जो सवाल मंगवाए थे, उनमें से पांच ही वापस आए। कहा गया, मोईजी बस इत्ता ही तैयार कर पाए हैं। तब पता चला कि राउल बाबा की चिल्लमचिल्ली की वजह से मोईजी की मेमोरी वीक हो गई है। ऐसा न होता तो मोईजी 'पुडुचेरी को वणक्कम' थोड़ी बोलते, 'हेहेहे व्यापारी' वाली लाइन के आगे गोल-गोल घुमा दिए होते। बहुत दिन से विदेश नहीं गए हैं बेचारे, और तो और टिरम्प चचा ने 26 जनवरी को इंडिया आने से इनकार कर दिया है।

मोईजी मुझे इंटरव्यू देंगे ये जानने के बाद मैं उसी स्ट्रेस में आ गया था, जिसमें तीन राज्यों में हारने के बाद हमारे मोईजी थे। अब वो सदन में सत्र शुरू होने से पहले प्रेस कांफ्रेंस किए दे रहे थे, खुद आईटी सेल परेशान थी कि मोईजी विरोधियों को मीम मटीरियल क्यों दे रहे हैं। राममंदिर का नाटक अलग चल रहा था, ऊपर से शिवसेना भी उत्पात मचाए हुए थी। कुल मिलाकर सिचुएशन बीजेपी के कंट्रोल से बाहर थी और कांग्रेस के 70 साल वाली पंचलाइन भी पब्लिक पर असर नहीं कर रही थी। ऐसे में मोईजी मुझे इंटरव्यू देंगे, ये बात समझ नहीं आ रही थी। पांचों सवाल एक पर्ची में लिए मैं समझ नहीं पा रहा था, 'मोईजी ने मुझे क्यों चुना?'

मुझे लगा पक्का मोईजी भयानक स्ट्रेस में हैं, वरना न तो मैंने मोईजी के फ्रेम वाली फ़ोटो अबतक लगाई थी और न ही 'मोई ही विकल्प' जैसा कुछ पोस्ट किया था। यही सोचते-सोचते सुबह हो गई। मैं 'एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' का ट्रेलर के बाद, पतंजलि के स्वदेशी ट्राउजर-कुर्ते में सजकर स्टूडियो आ गया। थोड़ी देर में मोईजी आते ही होंगे, किसी ने कहा। मेरी सवालों वाली पर्ची कहीं खो गई थी। पांचों सवाल याद ज़रूर थे लेकिन दिमाग में सीक्वेंस महागठबंधन के समीकरण की तरह गड़बड़ा रहा था। मैं रामविलास की तरह कंफ्यूज था, इंटरव्यू लूं या न लूं। फिर सोचा कि दिखेंगे मोईजी ही, मुझे तो बचे हुई फुटेज में बस टीवी पर आना है। मूंछों पर ताव दिया कि तभी हलचल बढ़ी और मोईजी आ गए।

हैरानी की बात थी, उन्होंने इसबार किसी के साथ सेल्फी नहीं ली। लग रहा था जैसे दिमाग में मेरी ही तरह रिवीजन कर रहे हों। पानी का ग्लास मैंने पहले ही हटवा लिया जिससे 'दोस्ती बनी रहे बस' की गुंजाइश खत्म हो जाए। कैमरा ऑन हुआ तो मोईजी थोड़ा कंफर्टेबल हुए, लेकिन पहला ही सवाल ट्रिकी था। राममंदिर पर उन्होंने पहले से तैयार आंसर धड़ाधड़ सुना दिया। कांग्रेस के वकीलों का अड़ंगा, कोर्ट की प्रक्रिया और न्याय का भरोसा जैसे शब्दों में पहला सवाल टला और 'इसमें रिक्स था, बाकी पिच्चर में देख लेना' सर्जिकल स्ट्राइक का आंसर दिया गया। पाकिस्तान धीरे-धीरे सुधरेगा और सबरीमाला वाली 'महिला' जज ने फैसला दिया, ये बोलकर अगले दो सवाल भी खिसकाए गए।

पांचवें जवाब में हिंट था जो आज समझ में आया। उंगलियां घुमाते हुए मोईजी बोले, 'देखिए प्राणेश जी, जिनके पास कोई विजन नहीं है, वही आरोप लगाते हैं। इस वक़्त बहुत से लोग नीतियों विरोध करते हैं, इसके मूल में जाना होगा। अगर आपको मैं इंटरव्यू न देता तो आप ही सवाल करते, मैंने आपको सवर्ण होते हुए भी चुना। आप कहते कि मैं सवालों के जवाब नहीं देता। जो विरोध करता है, वह भी हिस्सेदार होगा तो विरोध खत्म हो जाएगा।' जवाब की लास्ट लाइन में बहुत बड़ा हिंट था। फ़ॉर एग्जाम्पल, अगर मैं खुद घूस ले लूं तो नैतिक रूप से इसका विरोध नहीं कर पाऊंगा। नीरव-माल्या मुझे 20-50 करोड़ दे दें तो उन्हें वापस नहीं ला पाऊंगा, और मुझे भी आरक्षण मिले तो आरक्षण का विरोध नहीं कर पाऊंगा।

मुद्दा ये है भी नहीं, मुद्दा ये है कि मोईजी का विजन वो कारण खत्म करने का था, जिसकी वजह से सवर्ण 'ये बिक गई है गोरमिंट' वाले मोड में थे। अब गोरमिंट और मोईजी से अच्छा कोई नहीं क्योंकि आरक्षण की वजह से गमछा ओढ़ के नारे लगाने वाले चमन चंदू आईएएस नहीं बन पा रहे थे, सकल सडेलू की शादी नहीं हो रही थी और नंदू भड़कीले डीयू में एडमीशन नहीं ले पा रहे थे। अब सब हो जाएगा, 'अच्छे दिन आएंगे, सब आरक्षण पाएंगे और मंदिर वहीं.. ये छोड़िए।' अब समझ आया कि हमको इंटरव्यू देकर हमारी निष्पक्षता की ऐसी-तैसी कर दी गई और आरक्षण का लॉलीपॉप पकड़े सवर्णों की तरह हम खुद को टीवी पर देखके खुश हुए जा रहे थे।

'चलो हमारे बच्चों का भला कर दिए मोईजी' किसी अंडरपेड पत्तरकार की ये लाइन सुनकर बस अभी-अभी माथा पीटा और सर खुजाते हुए पांचवां सवाल याद करने लगा। वो सवाल था, 'मोईजी आपको क्या लगता है, 2019 का चुनाव आखिर किन मुद्दों पर लड़ा जाएगा?'

Saturday, 18 March 2017

डिजिटल होते इंडिया में खाली क्यों है साइबर स्पेस

                 एक डिजिटल होता देश भारत, जहां सब कुछ इंटरनेट पर उपलब्ध हो रहा है। डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा मिल रहा  है और सरकार से जुड़ी सभी योजनाओं की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध है। सोशल मीडिया के प्रयोग में भारत बेशक अव्वल नंबर पर हो लेकिन इसके बावजूद साइबरस्पेस में उसकी सहभागिता बहुत कम है और यह चिंता का विषय विषय है। डिजिटल होती सरकार और इंटरनेट पर आती जन योजनाओं के बीच यह समझना भी जरूरी है कि भारत में इंटरनेट सेवाएं किस हद तक मिल पा रही हैं। खासकर उन क्षेत्रों जहां मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो सकी है, वहां पर इंटरनेट का पहुंचना भारत के डिजिटल होने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। भारत का डिजिटल स्पेस या यूं कहें साइबरस्पेस बिल्कुल खाली दिख रहा है और ऐसे में सरकार या फिर देश के डिजिटल होने की बात बेमानी प्रतीत होती है। डिजिटल होने के प्रयास किए जाने चाहिए इसमें कुछ गलत नहीं लेकिन इसके लिए खुद को पहले तैयार करना होगा। भारत में अभी साइबरस्पेस का खाली होना यह दर्शाता है कि कहीं कुछ खामियां है जिन को दूर करना जरूरी है।
     साइबर स्पेस दरअसल  इंटरनेट पर लोगों की मौजूद होने से बनी आभासी दुनिया है जहां लोग ना सिर्फ विचार साझा करते हैं, बल्कि अपनी समस्याओं का हल भी तलाशते हैं। सोशल मीडिया साइट्स जैसे फेसबुक और ट्विटर साइबर स्पेस का एक बड़ा हिस्सा हैं। फेसबुक भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग साइट है इसका श्रेय स्मार्टफोन्स को भी जाता है। भारत में स्मार्ट फोन उपभोक्ताओं में कुल 72 प्रतिशत इंटरनेट पर का प्रयोग करते हैं। हम इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि देश की लगभग आधी आबादी के पास स्मार्टफोन नहीं है।  देश में लगभग 35% एक्टिव इंटरनेट यूजर हैं, यानी कि बाकी करीब 60% से ज्यादा लोग इंटरनेट पर लगातार एक्टिव नहीं रहते और यहीं साइबरस्पेस में खालीपन दिखता है। 
     
        80 के दशक में भारत आए इंटरनेट को स्मार्ट फोन आने के बाद गति मिली। दुनियाभर के इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में भारत का हिस्सा करीब 13.5 प्रतिशत है। भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है लेकिन इंटरनेट प्रोवाइडर्स बेहतर स्पीड उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं। साथ ही सुदूर क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच अभी मुश्किल है और इसमें अच्छा खासा वक्त लगना बाकी है।  इंटरनेट का उपयोग करने के मामले में भारत दुनिया के कई देशों के मुकाबले निचले पायदान पर है, श्रीलंका और भूटान जैसे छोटे देश भी भारत से काफी आगे हैं। डिजिटल इंडिया मिशन को चुनौती देते हुए आईसीटी एक्सेस, आईसीटी यूज और आईसीटी स्किल मामले में 166 देशों में इंडोनेशिया, श्रीलंका, सूडान, भूटान और केन्या जैसे देशों के बाद अब भारत का स्थान 129वां है। वहीँ फिक्स्ड ब्रॉडबैंड पहुंचाने के मामले में हम 125वें स्थान पर हैं। सौ लोगों की आबादी पर केवल 1.2 ब्रॉडबैंड कनेक्शन है जबकि विश्व का औसत सौ लोगों पर 9.4 का है। विकासशील देशों के वर्गीकरण में भारत में ब्रॉडबैंड की पहुंच 13 प्रतिशत घरों तक है और हम 75वें स्थान पर हैं। दरअसल भारत की आबादी ज्यादा है और इंटरनेट सुविधा उपलब्ध कराने वाली कंपनियों ने अपनी क्षमता से ज्यादा उपभोक्ताओं को कनेक्शन बांट दिए हैं। ऐसे में उपभोक्ता जब इंटरनेट का उपयोग करते हैं तो दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में 2 केबीपीएस की स्पीड भी नहीं मिल पाती। ऐसे में इंटरनेट का उपयोग बढ़ने की उम्मीद नहीं की जा सकती। 
     स्मार्ट फोन आने से जो इंटरनेट उपयोग बढ़ा है, वह सभी उपलब्ध सेवाएं उपलब्ध नहीं करा पाता। 80 फ़ीसदी से ज्यादा उपभोक्ताओं को इंटरनेट की स्पीड चार से 6 केबीपीएस से ज्यादा नहीं मिल पाने से इसका उपयोग नहीं होता या फिर कम रहा है।  सारी दुनिया में जहां 4जी के बाद 5जी सर्विस शुरू हो गई है, वहीँ भारत में हम 2जी की 56 केबीपीएस की न्यूनतम स्पीड तक उपभोक्ताओं को उपलब्ध नहीं करा रहे हैं और 4जी सेवा का लाने का दावा कर रहे हैं। 
      भारत पर इंटरनेट के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए साइबर सुरक्षा का मुद्दा भी यक्षप्रश्न बनकर खड़ा है। हाल ही में लीजन के साइबर अटैक ने भारत में साइबर सुरक्षा की पोल खोल दी है। हमारे देश पर हो रहे इस साइबर अटैक के पीछे अनेक संस्थागत आर्थिक और सामाजिक कारण थे, लेकिन यह देश में इंटरनेट के प्रयोग पर सवाल खड़े करता है। इसके अलावा हमारी अतिगोपनीय सुरक्षाओं के लिए अपरिहार्य 'क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर' पर अभी तक काम नहीं हो सका है। सरकार के मेल सर्वर को राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र देखता है और अंतर्गत आने वाले उपभोक्ताओं ने अब इसके टू फ़ैक्टर ऑथेंटिकेशन पर भरोसा करने से मना कर दिया है। इसके जरिए  सरकार की गोपनीय सूचना तक पहुंचा जा सकता है। 2014 में एक राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा संयोजक की नियुक्ति की गई थी परंतु राज्यों के साथ उनके संपर्क को बनाए रखने के लिए अब तक अधिकारी नियुक्त नहीं हुए। कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम में भी कर्मचारियों का टोटा है। इंटरफेस और ई-कॉमर्स वेबसाइट के मामले में भी भारत में इलेक्ट्रॉनिक फ्रॉड होता रहा है। साइबर सुरक्षा को लेकर सरकार की उदासीनता ने इसे बढ़ावा दिया है। विमुद्रीकरण के बाद सरकार उपकरणों और लेनदेन की सुरक्षा बढ़ाई देना ही डिजिटल लेनदेन की मजबूरी को सामने रख दी है। उल्टा रिजर्व बैंक ने 2000 रूपए तक के ट्रांजैक्शन के लिए 'टू मींस ऑफ आइडेंटिफिकेशन' यानी कि 2FA की जरूरत को भी हटा दिया है। ऐसे में बड़े लेन देन को भी हैक किया जा सकता है। डाटा हैकिंग का सिलसिला इंटरनेट उपभोक्ताओं के विश्वास को तोड़ सकता है। 
         इंटरनेट पर सामग्री की उपलब्धता पर भी सवाल उठाया जा सकता है। हमारे देश में 2.6 करोड़ रजिस्टर्ड लघु और मध्यम उद्योग है जिनमें करीब छह करोड़ को रोजगार मिला है। इनमें से 30 फ़ीसदी भी ऑनलाइन नहीं है। तकरीबन 33 लाख गैर सरकारी संस्थाएं यानी एनजीओ हैं। इनमें से 70 फ़ीसदी से भी ज्यादा ऐसी हैं जिनकी साइबर दुनिया में मौजूदगी नहीं है। विकासशील देश भारत में निर्वाचित प्रतिनिधियों पर बात करें तो हमारे यहां पंचायतों के लगभग 28 लाख 10 हज़ार निर्वाचन क्षेत्र हैं, विधानसभाओं के 4126 और लोकसभा के 543 निर्वाचन क्षेत्र हैं केरल की पंचायत को छोड़ दें ज़्यादातर पंचायतों के पास अपनी कोई वेबसाइट नहीं है।  बहुत सी सरकारी वेबसाइट्स पर भी स्थानीय भाषा में जानकारी उपलब्ध नहीं यह भी साइबरस्पेस के खाली होने की एक वजह है। 
      भारत का एक तबका डिजिटल होने को पूरी तरह तैयार है और हो भी रहा है जबकि दूसरा एक बड़ा तबका वंचित है और चाह कर भी साइबरस्पेस में जगह नहीं बना पा रहा है। इंटरनेट सेवा को बेहतर करने, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, इंटरनेट प्रदाताओं पर लगाम लगाना और ट्राई द्वारा उनके लिए नियम और मानक तय करना भारत की साइबर स्पेस में उपस्थिति को मजबूत और ठोस रूप दे सकता है। भारत में सोशल मीडिया इंटरनेट का दूसरा नाम  बनकर न रह जाए इसके लिए प्रयास जरूरी हैं और हर स्तर पर होने चाहिए। इंटरनेट सेवाओं को बेहतर बनाना इस दिशा में पहला कदम होना चाहिए क्योंकि वेबसाइट बनने से ज्यादा जरूरी है लोगों का उन तक पहुंचना। भारत की ऑनलाइन मौजूदगी से न सिर्फ देश समृद्ध होगा बल्कि दुनिया भर का बाजार हमारे करीब आ सकेगा। खाली पड़े इस साइबर स्पेस को भरने का यही सही वक्त है क्योंकि डिजिटल इंडिया के साथ जरूरी है सबका साथ, सबका विकास और सबका इंटरनेट। 

Friday, 27 January 2017

अधूरी भिखारन

हेडलाइट्स की रोशनी मुझे सोने नहीं देती, गाड़ियों की आवाज की तो ऐसी आदत पड़ चुकी है कि एहसास ही नहीं होता लेकिन हेडलाइट्स की चमक मेरी पलकों के उस पार ऐसे रंग भरती है जैसे मेरी जिंदगी ने कभी नहीं भरे। फुटपाथ पर करवट बदलते कब सुबह हो जाती है पता ही नहीं चलता। अक्सर खुद से पूछती हूं मेरी जगह फुटपाथ पर क्यों! क्या सिर्फ इसलिए कि ऊपरवाले ने मेरे दोनों हाथ मुझसे छीन लिए, या फिर इसलिए क्योंकि मैंने अपनी किस्मत के आगे घुटने टेक दिए। नहीं! मैंने अपनी किस्मत को कभी अपनी ज़िन्दगी नहीं माना। दिन बीतते गए, आसपास सब बदलता गया लेकिन मेरी हालत वही रही,'भिखारन'। पहले भिखारन बच्ची और अब भिखारन लड़की।
           
मैंने सिर्फ एक रिश्ता देखा और समझा, जिसे सब नाम देते हैं 'मां'। मैं तो अम्मा कहती थी, खूब बात करती थी उससे। अम्मा के पास मेरे हर सवाल का जवाब होता था। हां, मैंने अम्मा से एक सवाल कभी नहीं पूछा कि मेरे पास हाथ क्यों नहीं हैं? वो उदास हो जाती थी जब भी कोई बात मेरे अधूरेपन को लेकर होती. उसने कभी मुझे अधूरा नहीं रहने दिया, एहसास दिलाती रही कि मैं अधूरी नहीं हूं. अदूरेपन के एहसास को छिपाया जा सकता है लेकिन झुठलाया नहीं जा सकता. मेरी मां सिग्नल पर रुकने वाली गाड़ियों के सामने हाथ फैलाती तो मैं वैसा भी न कर पाती, बस अम्मा के साथ रहती थी. मुझे देखकर लोगों के मन में आने वाली दया चंद सिक्कों में सिमटकर मां के हाथ पर खनक पड़ती थी. कुछ ऐसे मेरा बचपन बीत और बदलते वक़्त ने मेरी मां को बूढ़ा और मुझे जवान कर दिया, मेरा अधूरापन अब मुझे और भी सताने लगा. मां कमज़ोर हो चली थी और सिग्नल पर गाड़ियों के रुकने पर ढोलक बजाती थी. मैंने भी कुछ करतब सीख लिए थे, मेरे पैर मेरे हाथों की कमी पूरी करने लगे थे। मैंने गाड़ियों को रुकते देखा है, ये लंबी गाड़ियां मेरे करतब से ज़्यादा उस अनोखे जीव को देखने के लिए रूकती थीं जो बिना हाथों के भी पैर से हवा में रंग उकेरता था। मैं जैसे जैसे बढ़ रही थी, गाड़ियों में बैठे लोग नीचे गिरते जा रहे थे। काश मैं बच्ची ही रहती, तब लोगों की आंखों में जो दया थी उसकी जगह अब कुछ और दिखने लगा था। मासूम नहीं रही थी न मैं, समझने लगी थी। तेजी से बीतते वक़्त और उसके साथ बदलती नज़रों के बीच एक हादसा हुआ। मेरे अधूरेपन का एहसास मुझे उस रोज हुआ जब मैंने सबकुछ गंवा दिया। उस दिन अम्मा मेरे साथ सड़क पार कर रही थी। हमेशा की तरह मैं आगे चल रही थी और वो पीछे। पहला कदम फुटपथपर पड़ने के साथ ही जाने कैसे उसका पैर फिसल गया। जब मैं पीछे मुड़ी तो मैंने अम्मा को गिरते हुए देखा और अगले ही पल पीछे से आ रहे ट्रक ने उसे टक्कर मार दी। तेज़ रफ़्तार ने एक झटके में मेरी छोटी सी दुनिया ख़त्म कर दी। मुझे अच्छे से याद है, अम्मा ने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया था। यह जानते हुए भी कि मैं उसका हाथ नहीं थाम सकती, उस पल उसका हाथ मेरी ओर बढ़ा था। मैं कुछ नहीं कर पाई सिवाय रोने और चीखने के। पुलिस उसकी लाश उठाकर ले गई। क्यों , कहां, पता नहीं। छोड़ गई मुझे, मेरे घर, उसी फुटपाथ पर। 
             जबसे अम्मा गई, सबकुछ बदल गया। उसकी ढोलक अब भी वहीँ रखी है, मेरे अधूरेपन का मज़ाक बनाती है। अब मैं कोई करतब नहीं करती, सिग्नल पर पांव में पकड़ा कटोरा ऊपर उठा देती हूं। गाड़ी में बैठे लोगों को अब मुझपर दया नहीं आती, उनकी नज़रें मेरे सलवार के घिसने से हुए छेदों में झांकती हैं। उनकी नज़र मेरे दोनों कन्धों के बीच ऐसे रुक जाती है, जैसे मेरी ज़िन्दगी रुकी है। मांगती हूं सबसे क्योंकि मेरी नज़र में वो मुझसे बड़े हैं, अमीर हैं, लेकिन हर गुज़रती गाड़ी अपने साथ मेरा कुछ ले जाती है। मैं यहीं छूट जाती हूं, टूट सी जाती हूं। अरे !देखो न, सुबह हो गई। फिरसे रुकने लगी हैं गाड़ियां  उसी सिग्नल पर जहां बिकना नहीं चाहती मैं, फिर भी लोग मुझे खरीदना चाहते हैं। इसके बावजूद भी कि मैं 'अधूरी' हूं, 'भिखारन' हूं।

Thursday, 5 January 2017

लड़की मैं हूं! लेकिन अब डरना तुम्हें चाहिए...


                        पापा मुझे बाहर कम जाने देते हैं, रात में जल्दी घर आने को कहते हैं, पार्टी करने की छूट नहीं देते, अनजान लोगों से बात करने से मना करते हैं। क्या वो मुझसे प्यार नहीं करते? वो बुरे हैं, ओपन माइंडेड नहीं हैं? नहीं! वो बहुत अच्छे हैं, मुझे आगे बढ़ने देना चाहते हैं, उड़ते हुए देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें रोकटोक करनी पड़ती है। पता है क्यों! तुम्हारी वजह से। सही सुना, तुम्हारी वजह से। 
                 उन्हें पता है, मैं सूट पहनकर निकलूं, टॉप पहनूं या फिर हिज़ाब... तुम्हारी तिरछी और बेशर्म नज़रें मेरी माप लेना चाहेंगी, झांकना चाहेंगी मेरे कपड़ों के अंदर, नज़रों से आगे बढ़कर छूना भी चाहोगे मुझे, क्यों? लड़की हूं इसलिए! 
हर तरफ, हर जगह, हर वक़्त तुम्हारी बेशर्मी दिखती है। क्या मुझे डरना चाहिए? झूठ नहीं बोलूंगी, डर लगता है। जितना गुस्सा आता है उससे ज़्यादा डर लगता है। कह सकती हूं कि कमज़ोर नहीं हूं, आज़ाद हूं, निडर हूं। लेकिन मुझपर लगने वाली पाबंदियों की वजह भी अपनों का यही डर है। 
                क्या मुझे इसलिए डर लगता है कि मैं लड़की हूं? नहीं! बेशर्म... डर इसलिए लगता है क्योंकि तुम इंसान नहीं रहे। पड़ोस में रहने वाले अंकल से लेकर मुझे फेसबुक पर मैसेज करने वाले अनजान शख्स तक, सब छूना चाहते हैं मुझे, खा जाना चाहते हैं। इंसान नहीं रहे हो तुम अब। हवस, बेशर्मी और अश्लीलता तुममें इस कदर भर चुकी है कि शायद अपनी मां के सूखते कपड़े देखकर भी तुम्हारा मन मचल जाता हो। मानसिकता को दोष नहीं देना, तुम भी पल्ला झाड़ लोगे। मानसिकता तुम्हें नहीं, तुम उसे वाहियात बनाते हो। चार महीने की बच्ची से लेकर 84 साल तक की बुज़ुर्ग तक सबमें तुम्हें दिखते हैं अंग। नहीं दिखती ज़िंदगी, नहीं दिखता एक मन। बस टूट पड़ना है तुम्हें, नोच लेना है मुझे। 

               कभी महसूस किया है ये डर। जब कोई बिना तुम्हारी मर्ज़ी के तुम्हें छुए, मसल जाए। सिर्फ तुम्हारा शरीर ही नहीं, मन भी दर्द से चीख उठता है। खुदसे नफरत होने लगती है, हज़ार बार धुलती हूं लेकिन वो घिनौना एहसास नहीं धुलता। शर्म नहीं आती तुम्हें, इंसान जो नहीं हो। मुंह पर शराफत का मुखौटा लगाए तुम्हें भी बस मौके की तलाश है। मैंने कुछ नहीं किया, तो पूरा बोलो न! मौका मिलेगा तो चूकूंगा नहीं। 
                 अब वक़्त तुम्हारे डरने का है। तुम्हें किसी मर्द ने नहीं जना, किसी मर्द से शादी नहीं हुई है, कोई मर्द राखी नहीं बांधता। कैसे यकीन दिलाओगे खुदको। जब तुम्हारी बेटी स्कूल जाएगी, तो तुम्हारे जैसा घिनौना टीचर खेल के नाम पर उसके कपड़ों में हाथ नहीं डालेगा। जब शाम को मां बाजार जाएगी तो उसे तुम जैसे भेड़िए दबोच नहीं लेंगे। भैया कोचिंग जा रही हूं बोलकर जाने वाली बहन को तुम्हारे जैसा हैवान गाड़ी में नहीं खींच लेगा। हर कोई तुम जैसा ही दरिंदा है अब, किस-किस से बचाओगे। अब तो डरना शुरू कर दो। 
                 ओह! तो तुम भी पाबंदियां लगा दोगे। बहन अकेले बाहर नहीं जाएगी, बेटी को पढ़ने और मां को बाजार नहीं भेजोगे। अच्छा, मर्यादा के नाम पर कितना जकड़ोगे मुझे। खुद मर्यादा का मतलब समझ सकते, तो बेहतर होता। जंज़ीरों में जकड़ा है न मुझे। अब सब ठीक रहेगा। रात में क्यों निकली, तो क्या दिन में बलात्कार नहीं होते? छोटे कपड़े क्यों पहने, तो हिज़ाब पहने लड़कियों को कोई नहीं घूरता? जवान लड़की बाहर क्यों निकली, बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं का रेप नहीं होता? 
                  बेवकूफ! तुम्हारी तर्कशक्ति मर चुकी है। पागल हो चुके हो तुम। मेरी ज़रुरत है न तुम्हें? अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए। तो मुझे ज़िंदा तो रखना पड़ेगा, बचाकर रखना पड़ेगा। अरे मुझे बचाने वाले भी तुम हो और नोचने वाले भी। पाबन्दी की ज़ंजीरें और कसते जाओगे। इसी डर की वजह से, जो तुमने पैदा किया है। अगर यूं ही कसती जाएंगी पाबन्दी की ज़ंजीरें तो मर जाऊंगी मैं, लेकिन मुझसे पहले तुम मरोगे। कमसे कम इस डर से तो डरो। मुझे मत बचाओ, खुद को बचाओ। वरना आओ, खा लो मुझे, नोच लो। मुझे मारो और तुम भी बदतर मौत मरो।

बेटी! ये चिट्ठी तुम्हारे लिए...

प्यारी बिटिया,
                    शायद पहला ख्याल तुम्हारे मन में यही होगा कि मैं ये चिट्ठी अभी से क्यों लिख रहा हूं, जबकि मैं खुद पूरे 21 साल का नहीं हुआ। मेरी बच्ची, शायद आज से दस साल बाद हालात ऐसे न रहें। सुधर जाएं या फिर बदतर हो चुके हों, इसलिए यही सही वक़्त है तुम्हें बताने का कि जब तक तुम मेरी उम्र की होगी हमारा रिश्ता कैसा होगा।
          मैं चाहता था कि काश! मैं लड़की होता। हंसो नहीं बुद्धू, दिखा देना चाहता था सबको कि एक लड़की के तौर पर मैं कौन हूं। पलटकर जवाब देना चाहता था सबको। लड़का हूं तब भी जवाब दिए, फटकार लगाई, आवाज़ उठाई, लेकिन एक सच को नहीं झुठला पाया कि मैं लड़की नहीं हूं और मैं लड़की होने का दर्द नहीं जानता। बस देख सकता हूं लड़कियों की तकलीफ, उसे महसूस नहीं कर सकता। पता है, मुझे अपने जैसा बेटा नहीं, तुम्हारे जैसी बेटी ही चाहिए थी।
    
   क्या लड़की होना सिर्फ दर्द और तक़लीफ़ देता है! नहीं मेरी बच्ची, कोई दर्द नहीं झेलोगी तुम, कोई तकलीफ नहीं होगी तुम्हें। कोई पाबन्दी, कोई रोकटोक नहीं झेलोगी तुम। बचपन में गैस और बर्तनों से भी खेलोगी और डॉक्टर की किट से भी। बन्दूक से भी खेलना और गुड़िया से भी, लेकिन तुम अपनी गुड़िया की शादी नहीं रचाओगी, उसे पढ़ाओगी और लड़ना सिखाओगी। बचपन में तुम्हें कमज़ोर होने का झूठा एहसास नहीं दिलाऊंगा, तुम सब कुछ कर सकती हो, यह बताऊंगा।
         मेरी बच्ची! स्कूल में अक्सर तुम्हें लड़की-लड़की सुनने को मिल जाएगा। शर्माना नहीं, गर्व महसूस करना। हंसी आए तो छुपाकर नहीं, खिलखिलाकर हंसना। सबसे बात करना, खूब सवाल करना। कुछ भी कहने में संकोच मत करना। कोई लाख समझाए क्या सही है क्या गलत, कोई सीमा रेखा नहीं होगी तुम्हारे लिए। लड़की हो, ये मत करो, वहां मत जाओ! खूब चीखेंगे लोग, उनकी एक मत सुनना। बेफिक्र भागना, दौड़ लगाना, उड़ने की कोशिश करना। घर आकर मुझे सारी कहानियां सुनाना और हम साथ ठहाके लगाएंगे।
          जब तुम ऐसा करने लगोगी न! लोगों को परेशान होते और तिलमिलाते हुए देखोगी। तुम्हारा हर आज़ाद कदम उनको अखरेगा और ऐसे में अगर कोई तुम्हारा हाथ पकड़कर आगे बढ़ने से रोके, अपनी पूरी ताकत से घूंसा मारकर उसका मुंह तोड़ देना। कभी कोई तुमसे लड़ पड़े, तो रोने मत लगना, न तो पापा से शिकायत कर दूंगी कहकर भाग आना। तुम्हें लगता है तुम सही हो, तो बस डटी रहना, हार मत मानना।
           मैं अभी जितना बड़ा हूं, जब तुम इतने की हो जाओगी, सब बदल जाएग। जब तुम रास्ते में निकलोगी, लोग तुम्हें घूरेंगे। नज़रें मत चुराना, उनकी आंखों में आंखें डालकर उन्हें घूरना और एहसास दिलाना कि तुम कौन हो। कोई बोले तुमसे, इसका इंतज़ार किए बगैर ही उसे करारा जवाब देना। अगर किसी की हिम्मत आगे बढ़कर तुम्हें छूने की हो तो कदम पीछे मत खींचना, आगे बढ़कर ऐसा वार करना कि उसे भी ज़िन्दगी भर याद रहे। बाकी एक और ऑप्शन है, तुम चाहो तो एक छोटी हथौड़ी अपने पर्स में रख लेना। ओहो! इसलिए नहीं कि तुम डरती हो, इसलिए जिससे सिर फोड़ने में आसानी हो। अपनी ओर उठने वाली हर नज़र से नज़र मिलाकर उसे शर्मसार करना। तुमपर कोई वार करे तो भागने के बजाय उसपर दोगुनी तेजी से वार करना। उसका सिर ज़रूर फोड़ना!
        जब तुम इतनी हिम्मत करने लगोगी मेरी बच्ची, सब तुमको लेकर राय बनाएंगे। तुम्हारे चलने, बैठने और बोलने के तरीके से भी उन्हें दिक्कत होगी। तुम किसी की एक मत सुनना, जैसा चाहो रहना। तुम्हारे कपड़े भी उन्हें अच्छे नहीं लगेंगे, लेकिन इतना पता है, उनकी सोच से ज़्यादा छोटे नहीं होंगे। कभी मत सुनना उनकी मेरी बच्ची, अपनी सुनना। डरने की गलती मत करना, डरकर सौ साल जीने से बेहतर होगा एक आज़ाद दिन जीना। अपने लिए ही नहीं, सबके लिए जीना। मुझे पता है तुम यह सोचकर आगे नहीं बढ़ जाओगी कि गड़बड़ है भी तो क्या, मेरे साथ तो नहीं। हर दोस्त के लिए लड़ना, हर अंजान के लिए, हर लड़की के लिए लड़ना। आवाज़ उठाना और अगर कोई न सुने तो हथियार उठाने में वक़्त मत लगाना।
        मैं ये नहीं कहूंगा कि खुदपर भरोसा है जो तुम्हें सही-गलत का मतलब सिखा दूंगा। तुमपर भरोसा है मेरी बच्ची, तुम जो करोगी सही होगा। अगर गलती से कोई कदम उठा भी लिया, तो ठोकर लगेगी और सीख जाओगी। तुम्हारा रक्षक नहीं बनूंगा, तुम्हें लड़ना सिखाऊंगा। हरदम साथ नहीं चलूंगा, अकेले चलना सिखाऊंगा। पिंजरे में बंद नहीं करूंगा, उड़ना सिखाऊंगा। जैसा कोई अपनी बेटी को नहीं बना सका, तुझे ऐसी बेटी बनाऊंगा।

तुम्हारा, बुद्धू पापा!
प्राणेश 
        

Wednesday, 30 November 2016

ठण्ड की वो शाम.. खाली बेंच और इंतज़ार

               उस शाम वो बसस्टॉप की ठंडी बेंच पर चुपचाप बैठा था। खाली, एकदम खाली। मन में ढेर सारे विचारों का गुबार सा उठ रहा था, लगातार कुछ सोच रहा था वो। उसे खुद इस बात का एहसास नहीं था कि बेंच पर बैठे एक घंटे से ज़्यादा वक़्त बीत चुका है और अंधेरा धीरे-धीरे घना होता जा रहा है। दरअसल वो खुद भी उलझा हुआ था, खुदसे ये पूछने में कि उसे क्या सोचना चाहिए और क्यों। विचार आते जा रहे थे और वो किसी मंझे हुए फुटबॉल खिलाड़ी की तरह उन्हें लात मारता जा रहा था। आखिर वह कर क्या रहा था, इस एक विचार को लात मारने ही वाला था कि रुक गया। हां! मैं क्या कर रहा हूं यहां? इतनी ठण्ड में। सामने एक बस खड़ी थी और उसकी खाली बेंच से दूर कुछ सवारियां बस के चलने के इंतज़ार में थीं। 'इंतज़ार', यहीं पर आकर आज थम गया वो। वो न तो कुछ करने आया था और न ही कुछ कर रहा था लेकिन अब उसके पास भी करने को कुछ था। ये कुछ था, इंतज़ार!
         उसने इंतज़ार करने का मन बनाया। किसी बस का नहीं, किसी इंसान का नहीं, किसी सपने, किसी चीज़ का नहीं। खुद का और इन विचारों के रुकने का इंतज़ार। अब उसे बेंच पर घंटों बैठने का मकसद समझ आ रहा था, वो भी तो इंतज़ार कर रहा था। वो बस सोचता जा रहा था, शायद खुद को तसल्ली देने के लिए सबसे आसान होता है इंतज़ार। हम किसी का करते हैं और कोई हमारा। इंतज़ार करने का ख्याल मन में आता ही किसी ज़रुरत के बाद है। हमें किसी की ज़रुरत हो और वो पास न हो तो इंतज़ार शुरू हो जाता है। हमें कुछ चाहिए और मिल नहीं पा रहा, क्या करेंगे इंतज़ार के अलावा। कई बार तो हमें भी नहीं पता होता हम किसका इंतज़ार कर रहे हैं, पर एक खालीपन होता है जिसे भरने की चाहत इंसान से लंबा इंतज़ार करवाती है। इंतज़ार करना विकल्प नहीं, ज़रुरत नहीं, मज़बूरी है। किसे अच्छा लगता है एक पल भी इंतज़ार करना, पर क्या करें करना पड़ता है।
       कभी सोचा है अगर इंतज़ार ही न हो तो! बेबस हो जाएगा इंसान। या तो बेचारा बन जाएगा या तो ताकतवर। तो कई बार इंतज़ार ज़िन्दगी भर का हो जाता है, कई बार ख़त्म हो जाता है। इंतज़ार जितना लंबा हो तक़लीफ़ उतनी बढ़ती जाती है। पर कोई क्या करे अगर इंतज़ार करते-करते अरसा बीत जाए और कोई न आए, क्या करना चाहिए उसे। खुद से यह कहना चाहिए कि बस अब और नहीं और ख़त्म करना चाहिए इंतज़ार, लेकिन सिर्फ तब जब खुदपर यकीन हो जाए। जब पता हो कि अब मुझे उसकी ज़रुरत ही नहीं जिसका मैं इंतज़ार करता रहा तो यही सही वक़्त है इंतज़ार ख़त्म करने का।
         उसके सामने से एक के बाद एक बसें गुज़र रही थीं, क्योंकि हर स्टॉप पर लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे। लोग बस का इंतज़ार कर रहे थे क्योंकि कोई उनका इंतज़ार कर रहा था। बेंच खाली है फिर भी कोई सवारी उसपर नहीं बैठती, इसकी वजह भी इंतज़ार है। इंतज़ार भी ऐसा जो चैन से बैठने नहीं देता, सुकून नहीं मिलने देता। बस खाली है फिर भी उन्हें जल्दी चढ़ना है जिससे उनका इंतज़ार जल्दी ख़त्म हो। इंतज़ार भी जब हद से ज़्यादा बढ़ जाए तो परेशान कर देता है।
         इंतज़ार करने वाले को ज़रुरत पूरी होने से ज़्यादा उसे पूरा करने वाले का इंतज़ार होता है क्योंकि अक्सर लोग यह समझने की भूल कर बैठते हैं कि उस एक चीज़ के अलावा ज़रुरत पूरी करने के लिए कोई विकल्प नहीं। वो उन परेशान चेहरों को देख रहा था जिन्हें उनकी बस का इंतज़ार था, बार-बार सड़क के दूसरे छोर को देख रहे थे। किसी भी बड़ी बस को आता देख उम्मीद बांध लेते थे और पास आकर वो निराश कर जाती थी। उन्हें सिर्फ अपनी उसी बस का इंतज़ार था जो उनका इंतज़ार कर रहे दूसरों का इंतज़ार ख़त्म कर सके। सामने खड़े ऑटो को सारे ऐसे नज़रंदाज़ कर रहे थे मानों वो वहां हों ही नहीं। इंतज़ार तो उन्हें बस का था न! भूल ही गए थे वो कि शायद आधे घंटे से अपनी बस का इंतज़ार करने से बेहतर होगा ऑटो से जल्दी जाकर बाकियों का इंतज़ार ख़त्म करना।
       उफ़! कितना उलझे हुए हैं सब आपस में, उसने खुदसे पूछा। अच्छा लगने लगा उसे यह सोचकर कि उसे किसी बस का इंतज़ार नहीं करना क्योंकि किसी को उसका इंतज़ार नहीं और उसे कहीं जाने की जल्दी नहीं। उसकी यह खुशी अचानक फीकी पड़ गई, चेहरे का रंग उतर गया और आंखें भर आईं। कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा, क्या सच में! पिछले तीन घंटे में किसी ने नहीं पूछा कहां हो, आ जाओ न। मोबाइल की स्क्रीन भी सिर्फ वक़्त बता रही थी, कोई मैसेज नहीं था वहां। इसका सीधा मतलब तो यह हुआ कि किसी को उसको ज़रुरत ही नहीं। उसे गुस्सा भी आया और रोना भी, मन बना लिया कि अब इस बेंच से तब तक नहीं जाएगा जब तक कोई उसे बुलाता नहीं।
         वक़्त बीत रहा था और उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। क्या सच में किसी को उसकी ज़रुरत नहीं, यह सच वो मानने को तैयार ही नहीं था। इससे पहले कि पलकों पर ठहरे आंसू बाहर आने की जगह बना पाते, अचानक वह हंस पड़ा। इस हंसी की वजह थी उसकी अपनी नादानी। इंतज़ार के बारे में सोचते-सोचते वो खुद इसके चंगुल में फंसकर गंवा बैठा था अपना चैन। वो भी तो इंतज़ार करने लगा था किसी के फ़ोन का, किसी मैसेज का, किसी के ये कहने का कि जल्दी आ जाओ, तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं। बेवकूफी और बेफिक्री से उसने अपने आसपास देखा। बेंच, लोग, बसें और उनका इंतज़ार। समझने लगा था वो।
    किसे पता था वो यहां आएगा, बैठेगा और इंतज़ार के बारे में सोचेगा। शायद यह जगह उसका इंतज़ार करती रही हो, इस बेंच को उसका इंतज़ार रहा हो। अगर न भी रहा हो तो क्या उसे इसलिए यहां नहीं होना चाहिए था कि यहां कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा था। वह अपनी नादानी पर हंस रहा था।
       उसे अब किसी का इंतज़ार नहीं बनना था, क्योंकि खुद भी किसी का इंतज़ार नहीं करना था। इतना मतलबी नहीं था वो कि सिर्फ लोगों का इंतज़ार ख़त्म कर उनकी ज़रूरतें पूरी करे। उसे हर उस जगह रहना था जहां वह उन लोगों को हंसी बांट सके जो परेशान हैं और जिन्हें किसी और इंतज़ार की वजह से चैन-सुकून नहीं मिल रहा। वो हर किसी के साथ था, मदद कर सकता था। उसे कोई जल्दी भी नहीं थी क्योंकि कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा था। अब उसका खुदका इंतज़ार भी ख़त्म हो चुका था, वो तो उसके मन में था ही नहीं। अब वो इस जगह से जाने को तैयार था, सचमुच तैयार। बढ़ते अंधेरे ने उसके मन में उजाला कर ही दिया था। चलने को तैयार, मुस्कराकर वो बेंच से उठा और पीछे मुड़कर बोला, 'सुनो! मेरा इंतज़ार मत करना।'

Saturday, 26 November 2016

मेट्रो सा मन मेरा,कुछ पल ठहरा पर चलता ही रहा


               दिल्ली में कहीं ज़मीन से ऊपर तो कहीं ज़मीन से नीचे दौड़ती मेट्रो, जिसे राजधानी की जीवन रेखा भी कहा जाता है, अपनी अलग जगह बना चुकी है। जब मैं पहली बार दिल्ली आया तो सबसे ज़्यादा रोमांचक मेरे लिए मेट्रो का सफर रहा। अब यह  रोमांच मेरी ज़रुरत बन चुका है और मेट्रो मेरी दोस्त। मेट्रो से अब ऐसा लगाव हो चुका है कि खुदमें इसको ढूंढने लगा हूं। मैंने पाया है मेट्रो को.. मुझमें। 
         मेट्रो मेरा मन है, जो बस चलता ही जाता है। उसी रफ़्तार से, उसी सीधे रास्ते पर, जहां से होकर जाता है मेरी ज़िन्दगी का सफर। एक के बाद एक आनेवाले स्टेशन मेरी ज़िन्दगी के पड़ाव होते हैं और इसमें चढ़ने वाली सवारियां मेरी यादें। यादें, कुछ अच्छी, कुछ बुरी, कुछ कमज़ोर, कुछ ताकतवर, अलग-अलग तरह की ढेर सारी यादें। यूं तो हर याद सुरक्षा जांच के बाद ही मेरे मन में जगह बनाती है, लेकिन इसके बावजूद भी कुछ ऐसी यादें अंदर आ ही जाती हैं जो आसपास की दूसरी यादों को भी परेशान कर देती हैं। अक्सर सोचता हूं काश! मैं खुद चुन सकता कि कौन सी याद मेरे मन में जगह बनाएगी और कौन सी नहीं। लेकिन मेरी मर्ज़ी नहीं चलती, जो याद पहले आती है जगह पाती है और मेरा हिस्सा बन जाती है। दरवाज़े बंद करके चल पड़ता है मन अगले पड़ाव की ओरक्योंकि ज़िन्दगी कभी नहीं रुकती। 


           जब मेट्रो ज़मीन से नीचे चलती है तो मन मानो शांत होता है। न यादों को बाहर की तेज़ धूप या यूं कहूं दुनिया वालों की नज़र का एहसास होता है और न फ़िक्र। जब मेट्रो सा मन लोगों की नज़र में आने लगता है और यादों को नज़र लगने का डर रहता है तो मेरी भावनाओं की ठंडक उसकी यादों को परेशान नहीं होने देती। इन यादों को सुरक्षित समेटे और समझदारी का अनाउंसमेंट सुनाते बढ़ता जाता है मन। 
              न तो मैं रुका और न ही इन यादों को कभी रोकने की कोशिश की। नई यादों को जगह देने के लिए पुरानी यादों को जगह खाली करनी ही होती है। पुरानी यादें छोड़ता चलता हूं क्योंकि कई बार यह भी ज़रूरी हो जाता है। एक पल ऐसा भी आता है कि मन की मेट्रो में यादों के लिए जगह नहीं बचती और मैं दरवाजे बंद कर लेता हूं। छोड़ देता हूं बाकी यादों को पीछे। यादों की भीड़ मुझमें जगह बनाने की भरसक कोशिश करती है, लेकिन क्या करूं सारी यादें तो नहीं बटोर सकता। यह भी सोचता हूं कि शायद कोई अच्छी या फिर ऐसी याद पीछे रह गई हो जिसे मेरी ज़्यादा ज़रुरत थी। कहते हैं जो पीछे छूट जाए उसके बारे में सोचकर दुखी होने से अच्छा है कि आगे आने वाले पड़ावों से यादें साथ ले ली जाएं, मैं भी  यही करता हूं। 
                   मेट्रो की लाइनें और उनके रंग याद दिलाते हैं जिंदगी के रंगीन पहलू। लाल मेरा प्यार, पीला मेरी दोस्ती और नीला मेरा परिवार। सफर में राजीव चौक सा एक पड़ाव ऐसा भी आता है। जब ये तीनों लाइनें आपस में मिलती है और इतनी ढेर सारी यादें पास होती हैं कि उलझन सी होती है। दोस्ती, परिवार और प्यार के बीच अंतर कम हो जाता है। कई बार तो यादें भी नहीं समझ पातीं कि उन्हें दोस्ती वाली लाइन में जाना है या प्यार वाली। लेकिन इस सबसे अलग मेट्रो चलती रहती है। राजीव चौक ही क्यों न हो, यादों के पास ज़्यादा वक़्त नहीं होता, उन्हें भी पता होता है कि अगर छूट गईं तो लंबा इंतज़ार करना होगा। 
           मेरे मन की मेट्रो जैसे-जैसे आखिरी स्टॉप या यूं कहूं मेरी मंज़िल तक पहुंचती जाती है, पुरानी यादें तो पीछे छूटती चलती ही हैं, नई यादें भी कम जगह बनाती हैं। मंज़िल पर पहुंचकर मैं बिल्कुल खाली हो जाता हूं लेकिन मन का खालीपन वापस भरने का मन करता है। मैं लौटना चाहता हूं वापस उसी सफर पर, उन्हीं पड़ावों पर। समेटना चाहता हूं यादें एक बार फिर। मैं ठहरता जरूर हूं पर रुकता नहीं, क्योंकि मैं मेट्रो हूं, मन हूं। अरे हां, मेट्रो सा मन हूं।

Monday, 3 October 2016

बदल रहा हूं...

क्या कभी खोए हो तुम,
भीड़ में अपनों के बीच!
कभी रोये हो तुम,
या कभी टूटकर सोए हो तुम।

शायद नहीं, पर मैं रोता हूं...
इसलिए नहीं कि खोना नहीं चाहता।
इसलिए नहीं, कि बिखरे मोती पिरोना नहीं चाहता।
इसलिए, क्योंकि हर बार ये माला टूट जाती है।
बिखर जाते हैं मोती फिर से, आस छूट जाती है।

चुनौतियां पसंद हैं मुझे, मिलती ही जाती हैं।
एक पल मुस्कराकर, ज़िन्दगी फिर रूठ जाती है।
खुद को साबित करते करते, बहुत थक जाता हूं।
भर आती हैं आंखें जब, मुस्कराकर छुपाता हूं।

जी रहा हूं ज़िन्दगी, या फिर ये मुझे जी रही है।
यादों के परदे का वो छेद, उम्मीदें सी रही हैं।
सच्ची और झूठी बातें अब तक एक सी रही हैं।
आंखों का नहीं पता, आंसू क्यों पी रही हैं!

सच और झूठ के इस फेर से अब निकल रहा हूं,
भारी हैं कदम, बढ़ते नहीं, फिर भी चल रहा हूं।
कभी-कभी ऐसा लगता है खुद को ही छल रहा हूं,
या फिर क्या सच में, 'मैं बदल रहा हूं।'
-: प्राणेश तिवारी 

Friday, 23 September 2016

'मैं लड़की हूं'

माना मैं एक लड़की हूं,
पर हूं तो एक इंसान।
क्या फ़र्ज़ नहीं बनता है तुम्हारा,
कि करो मेरा सम्मान...

भोली हूं मैं, नादान हूं।
पर क्या यही मेरी गलती है!
मुझे बेजान समझना, और खेल जाना मुझसे।
इससे तुम्हें क्या ख़ुशी मिलती है?

दोस्त माना था तुम्हें, साथी माना था।
मुस्कान तुम्हारी सच्ची लगी, ऐसे पहचाना था।
पर क्या पता था, तुमने एक मुखौटा लगाया है।
अपने बेशर्म चेहरे को भोलेपन से छुपाया है।

मैंने नहीं दिया हक़ किसी को, जो चाहे जताने का।
मेरे बारे में कुछ भी बोलने का, मज़ाक बनाने का।
पर फिर भी ऐसा करते हो, तो शर्म करो इंसान हो।
शक होता है अब मुझको भी, तुम मानस की संतान हो।

तय करते हो मेरा चरित्र और नाम मुझे तुम देते हो।
एक पल में मन में अपने तुम, जो चीर मेरा हर लेते हो।
कायर हो, तुम हो बेईमान, काश ये खुद को समझाओ।
बेहतर होगा चुल्लू भर पानी में डूबो और मर जाओ।
                           
                                             : प्राणेश तिवारी

Thursday, 22 September 2016

'उधार'

शायद उधार अभी बाकी है,
नहीं पैसे नहीं! ना कोई सामान!
बाकी है तुम्हारे पास फिर भी बहुत कुछ मेरा।
याद रहेगी साथ बीती शाम, साथ हुआ सवेरा।

यूं तो मैं देता नहीं हर किसी को वक़्त अपना,
दिया तुम्हें, देखा तुम्हारे साथ, तुम्हारा सपना।
कर सकोगे वापस वो वक़्त मुझे!
कहां से लाओगे वो पल जो चले गए?

हां, सिर्फ मैं ही नहीं तुम भी तो कर्ज़दार हो।
ऐसा लगता है मुझपर कम तुमपर ज़्यादा उधार हो।
बांटे थे जो आंसू तुम्हारे, वापस नहीं मांगूगा।
पर खुद से वादा है, अब किसी का दर्द नहीं बांटूगा।

क्या वो तुम ही थे जो कंधे पर सिर झुकाकर रोए थे,
हां तुम ही तो थे जो मुझे दोस्त मान बेफिक्र सोए थे।
याद है न! कि ये भी भूल गए हम साथ थे।
अंधेरे रास्ते पर हाथों में हाथ थे, जज़्बात थे।

बहुत भोले हो मेरे दोस्त अच्छे से जानता हूं।
पर यह भी सच है कम लोगों को अपना मानता हूं।
तुम उन्हीं कम लोगों में से एक थे, क्योंकि नेक थे।
समझ जाना था पहले ही तुम्हें, पर समझे देर से।

हां! बुरा हूं मैं! जल्दी रूठ जाता हूं।
आवाज़ नहीं आती फिर भी टूट जाता हूं।
रोता हूं अकेले में पर सामने गुस्सा दिखाता हूं।
एक बार गया तो लौटकर वापस नहीं आता हूं।

-: प्राणेश तिवारी

Tuesday, 12 July 2016

'तोता-मैना स्थल' बन चुके शहर के पार्कों में बहती प्रेम-रस की धारा...

          सुबह-सुबह ठंडी हवा और हरियाली में टहलना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है. शहरों में कंक्रीट की इमारतों की भेंट चढ़ती हरियाली को बचाने और लोगों को स्वस्थ रखने के लिए पार्क बनाए गए. सुबह शाम यहां टहलने आने वालों की संख्या सैकड़ों में है. हर दूसरा मधुमेह का मरीज डाक्टर की सलाह मानकर कार से ही सही लेकिन पार्क तक ज़रूर आता है. लेकिन जितना मधु इन पार्कों में है, उसके दर्शन मात्र से ही आप बीमार हो सकते हैं.

         मुद्दा जरा अटपटा लग सकता है, लेकिन न आप और न ही मैं इससे अंजान हैं. मेरा एक साथी मजाकिया लहजे में अक्सर कहता है दुनिया में प्यार कहीं है, तो पार्कों में! वैसे तो  घूमने का आनंद गाँवों में कहीं भी मिल जाता है, लेकिन उस रोज ऑफिस के असाइनमेंट के चलते एक पार्क के भ्रमण का सुअवसर मिला. हम गन्दगी और अव्यवस्था से जड़ी खबर ढूंढने निकले थे, प्रवेश करते ही साथी का जुमला याद आ गया.


        पार्क में ओर प्रेम की धारा बह रही थी. कहीं पेड़ की छांव तो कहीं हरी घास पर प्रेम-पुजारी अपनी साधना में लीन थे. दीन-दुनिया से बेफिक्र उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आसपास कौन आ-जा रहा है. लग रहा था जैसे बिना कैमरे और डायरेक्टर के ढेर सारी रोमांटिक फिल्मों की शूटिंग एकसाथ चल रही है. शायद ये हास्यास्पद लगे लेकिन अब मैं खुदको असुरक्षित महसूस कर रहा था. नज़रें झुकाकर किसी अपराधी की तरह मैं पार्क में प्रवेश कर रहा था क्योंकि इस प्रेम रस से ज़्यादा ज़रूरी मेरे लिए अव्यवस्था और गन्दगी की खबर निकालना था.

        आगे बढ़कर देखा तो पार्क में सफाई का आलम यह था कि रात को पेड़ों से गिरे पत्ते भी भोर अंधेरे साफ़ कर दिए गए थे. झाड़ू से बने लकीरों के निशान ज़मीन पर अब भी नज़र आ रहे थे. घास काटने की मशीनें आवाज़ करके कर्तव्यनिष्ठा दिखा रही थीं और खबर जैसा यहां कुछ भी न था. शायद यह मेरी ही गलती थी कि मैंने शहर का एक बड़ा और नामी पार्क चुन लिया था. फिर भी यहां आसपास के माहौल से ऐसा लग  रहा था मानो मैं किसी गलत गली में आ गया हूँ.

       देर न करते हुए खाली हाथ मैं वहां से लौटने को हुआ तभी माथा ठनका. प्रेम साधना में लीन युगलों की तपस्या को भंग करने  के लिए अप्सराओं रुपी गार्ड नदारद थे. गेट को छोड़कर पूरी पार्क में किसी सुरक्षा गार्ड की परछाईं तक नहीं दिखी तो मैंने तफ्तीश करने का मन बनाया. पता चला दिन और रात दोनों में 24-24 गार्ड तैनात होने चाहिए, लेकिन शायद वो भी प्रेमलीला में बाधा पहुंचाकर पाप के भागी नहीं बनना चाहते.

          लगभग हर पार्क में ऐसे दृश्य अब आम हो चलें हैं. इसका परिणाम यह है कि कोई भी सपरिवार पार्क में पिकनिक मनाने नहीं आना चाहता. मैं भी ऐसा करने की सलाह नहीं दूंगा. इससे तो बेहतर है कि आप पूरे परिवार के साथ सेंसरबोर्ड से 'ए' सर्टीफिकेट पाने वाली 'उड़ता पंजाब' फिल्म देख लें. आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता फैलाना अगर कहीं से भी तर्कसंगत लगता हो तो मैं इच्छुक जन को बहस के लिए आमंत्रित करना चाहूंगा.

           पार्क से निकलने से पहले बाहर बैठी महिला गार्ड से बातचीत में अलग ही पहलू सामने आया. परिवारों के पार्क में न आने के सवाल पर हंसते हुए बोलीं,'ये तो कपल-पार्क है न बाबू.' स्पष्ट जवाब देते हुए उन्होंने कहा 'मैं तो साफ़ बोलती हूँ. अगर ये प्रेमी पार्क न आएं तो पार्क कल ही बंद हो जाएगा. सुबह टहलने आने वालों ने मासिक पास बनवा रखे हैं, ऐसे लोग भी सैकड़ों में हैं. दिन भर पार्क में जमे रहने वाले जोड़ों की वजह से रोजाना हज़ारों टिकट बिकते हैं. उल्टी-सीधी हरकत करते पकड़े जाने लड़के-लड़कियां अपने दोस्तों को मम्मी-पापा बनाकर उनसे बात करवा देते हैं.'

           पार्क में बढ़ती प्रेमियों की भीड़ पर भी उन्होंने सटीक वजह बताई. कहा,'बड़े-बड़े घर के  लड़के-लड़कियां आते हैं.  मॉल जाएंगे तो पिक्चर देखने और खाने में कम से कम हज़ार पांच सौ रूपए का खर्च आएगा. यहां सुबह नौ से रात नौ बजे तक खुले पार्क में पांच रुपए में काम बन जाता है. बहुत ज़्यादा तो सौ-दो सौ रुपये तक कुछ खा पी लेते हैं. स्कूल-कॉलेज यूनीफार्म में लड़के-लड़कियां रोजाना आते हैं और टोकने पर लड़ने पर उतारू हो जाते हैं.

           यह लेख कई आधुनिक सोच वाले और मॉडर्निटी की पैरवी करने वालों को आपत्तिजनक लग सकता है. उनसे मैं पहले ही स्पष्ट कर दूं, आधुनिकता और विस्तृत सोच का पार्क में किसी की गोद में सिर झुकाने से कोई वास्ता नहीं है. आधुनिकता आचरण और दिखावे से पहले मानसिकता में दिखनी चाहिए. बेशर्मी आधुनिकता का पर्यायवाची  न कभी था और न हो सकता है.


           एक उपाय जो समझ आता है वो है पार्कों में सीसीटीवी कैमरे लगवाना और सुरक्षा गार्ड्स की सक्रियता. पार्क जिस उद्देश्य से बनाए गए थे वह पूरे हों तो परिणाम सुखद होंगे. वरना रोज़ प्यार के नाम पर चल रही अश्लीलता और इससे जुड़े अपराधों को नज़रअंदाज़ करते हुए पार्कों का नाम 'तोता मैना स्थल' ही कर दिया जाना चाहिए. साथ ही क्लबों की तरह इनमें भी बोर्ड लगने चाहिए,'एंट्री ओनली फॉर कपल्स!'
(सभी तस्वीरें: गूगल से साभार)

Saturday, 30 April 2016

अधूरा सच, एक वाकया जिसने मुझे एहसास कराया- आँखें हमेशा सच नहीं देखतीं!

आँखें हमेशा सच देखें ये ज़रूरी नहीं! फिल्मों में ऐसा दिखाना ज़रा आसान होता है, आम जिंदगी में ऐसा होगा एक बार को कोई नहीं मानता. रोज़ हमें जाने कितनी ख़बरें देखने को मिलती हैं, और हम एक पल में उनपर यकीन कर लेते हैं. एक वाकया हुआ मेरे साथ और मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि किसी मामले में अपनी राय बनाने में हम ज़रा भी वक़्त नहीं लगाते.

हुआ यूं कि 25 अप्रैल, सोमवार शाम मैं लखनऊ से वापस घर लौट रहा था. मैंने सड़क के किनारे अंगौछा बिछाकर बैठे एक बुजुर्ग को देखा. मुझे लगा शायद कोई भिखारी होगा. मैं घर पहुंचा और थोड़ी देर बाद किसी काम से फिर बाहर निकलना पड़ा. वो बुजुर्ग अब भी वहीँ बैठा था. तभी एक लगभग 40 साल का व्यक्ति वहां आया और उसने बुजुर्ग को पीटना शुरू कर दिया, बेहद गुस्से में दिख रहे उस व्यक्ति ने बुजुर्ग से भीख में मिले पैसे दिखाने को कहा और उसे भगाने लगा.


ये देखकर मुझे बेहद गुस्सा आया. एक बार को मन हुआ कि इसका वीडियो बनाऊं और पुलिस में दे दूं. अंधेरा होने की वजह से ऐसा नहीं कर पाया, लेकिन मुझसे और नहीं सहा गया. आखिर मैंने उससे पूंछा कि वो ऐसा क्यों कर रहा है. बेहद गुस्से में मैंने उसे ऐसा करने से मना किया.

अगले ही पल उसका रोल बदल गया, उस निर्दयी से दिख रहे आदमी की आँखें भर आई और उसने कहा, 'बेटा! ये मेरे बड़े भाई हैं. जाने कब एक रेल हादसे में इनके दोनों पैर कट गए. आठ साल तक ये घर वापस नहीं लौटे. अचानक एक दिन देवां में हाजी वारिस अली शाह की दरगाह  पर गए मेरे गाँव के कुछ लोगों ने इन्हें भीख मांगते हुए देखा. जून 2015 में मैं भी इन्हें ढूँढ़ने दो बार वहां गया और इन्हें घर वापस लाया.

तब से ये मेरे साथ रह रहे हैं, जो हम खाते-पहनते हैं वही इन्हें भी देते हैं. इन्हें घर में बोरियत होती है. तो हमने इन्हें बाहर कुर्सी पर बिठाना शुरू किया, लेकिन ये अपनी आदत से मज़बूर हैं. आज दोपहर में मेरी आँख लग गई और मौक़ा पाते ही ये घर से बाहर निकल आए, भीख मांगने बैठ गए. ऐसे में बेटा आप ही बताओ, मुझपर क्या बीतेगी। सब देखकर यही कहेंगे कि बिचारे को कुछ खाने को नहीं देता, परेशान करता हूँ.

जो इंसान कुछ देर पहले तक क्रूर और निर्दयी लग रहा था, अब आँखों में आंसू लिए बेचारा लग रहा था. मैं कुछ बोलने की हालत में ही नहीं था. वह खुद ये मान रहा था कि बड़े भाई को डांटना या उनपर हाथ उठाना उसे तकलीफ देता है, लेकिन जब भाई ऐसी हरकत करे तो गुस्सा आना वाजिब है.

अब मैं शर्मिन्दा था, मैंने बिना पूरी बात समझे उसे बुरा समझ लिया था. आँखों ने जो देखा उसे सच मान बैठा, क्योंकि भरोसा है इन आँखों पर, जो नज़रों के सामने हो वो झूठ कैसे हो सकता है. आज हमारी आँखें रोज ऐसे अधूरे सच देखती हैं  और उनपर एक पल में यकीन कर लेती हैं. किसको इतनी फुर्सत है कि हर घटना पर रिसर्च करे.

मैं सोच रहा था अगर मैं उस आदमी से बात ही न करता और उसका वीडियो बनाकर शेयर कर देता तो चंद घंटों में उसे सैकड़ों लोग भला-बुरा कह रहे होते, कमेंट्स की बाढ़ आ जाती. जो इंसान सच में अच्छा है उसे बुरा बनने में वक़्त नहीं लगता. रोज हम जाने कितने वायरल वीडियोज़ और फोटोज पर आँखें मूँद कर भरोसा करते हैं और किसी इंसान को बुरा या हीरो मान लेते हैं.

ये घटना मैंने आपसब के साथ सिर्फ इसलिए शेयर की, जिससे अगली बार आप किसी भी फोटो या तस्वीर को देखकर अपनी राय न बनाएं. समझने की कोशिश कीजिये, आपको कितनी  आसानी से बेवकूफ बनाया जा रहा है. तो अगली बार अगर आपको कोई ब्रेकिंग न्यूज़ उड़ती भैंस की दिखे तो सिर्फ वीडियो पर भरोसा न करें, क्योंकि आँखों देखा हमेशा सच हो ये ज़रूरी नहीं!

Monday, 25 April 2016

पता भी नहीं चलेगा और हो जायेंगे 'बैंक फ्रॉड' (ठगी) के शिकार! कैसे बचें...

बैंक की पहुँच अब हमारे लैपटॉप से लेकर मोबाइल तक हो चुकी है. ऑनलाइन शॉपिंग युवाओं के बीच ट्रेंड बन चुका है., ऐसे में ठग और जालसाज भी हाईटेक तरीके अपना रहे हैं. आइये जानते हैं क्या हैं ये हाईटेक तरीके और कैसे होगा इनसे बचाव,

   फिशिंग(इन्टरनेट फ्रॉड)


इसमें आपके मेल इनबॉक्‍स में आपकी बैंक से एक मेल आता है.
इसके जरिए आपका बैंक अकाउंट नंबर, पासवर्ड और कई व्यक्तिगत जानकारी मांगी जा सकती है.
कुछ मेल लॉटरी निकलने के होते हैं, जो लालच देते हैं.
ऐसे मेल फर्जी होते हैं जो ठग भेजते हैं.
अपना पासवर्ड या एटीएम पिन कभी भी मेल पर शेयर न करें.
बैंक कभी भी आपकी निजी जानकारी मेल से नहीं मांगते.


              वेब फिशिंग(फर्जी साइट)

वेबसाईट फिशिंग में अटैकर्स एक असली वेबसाईट जैसा दिखने वाला पेज बना देते है.
लोग धोखे में आकर उनमें लॉग इन कर देते हैं.
इससे आपके डीटेल्स और पासवर्ड उनके पास चले जाते हैं.
असली साईट के नाम से पहले बंद ताला बना दिखता है.
साथ ही हरे रंग से https लिखा होता है.




 विशिंग(अकाउंट डीटेल्स का वेरिफिकेशन)

इसमें अटैकर आपको फ़ोन कर आपसे जानकारी हासिल करता है.
कॉल में दूसरा व्यक्ति खुद को आपको बैंक या क्रेडिट कार्ड का एक्जिक्‍यूटिव या मैनेजर बताता है.
वह आपको लुभावने ऑफर देता है या अपनी निजी जानकारी वैरीफाई करने को कहता है.
अगर आपने क्रेडिट कार्ड या ऐसी सुविधा के लिए अप्लाई ना किया हो तो निजी जानकारियां बिल्कुल न दें.
true-caller app इसमें मदद कर सकता है.

         

         स्मिशिंग(बैंक का फेक SMS)

आपको बैंक की और से एक फर्जी SMS मिलता है.
जिसमें अपने डीटेल्स मैसेज में टाइप कर भेजने की बात लिखी होती है.
यह SMS आपकी जानकारी वैरीफाई करने का दावा करता है.
भूल से भी ऐसे किसी मैसेज का जवाब न दें.

  
    
    स्किमिंग(डेबिट कार्ड से शॉपिंग)

यह फ्रॉड डेबिट या क्रेडिट कार्ड से शॉपिंग करते वक़्त हो सकता है.
इसमें रीटेलर आपका कार्ड मशीन में स्वाइप करता है.
मशीन के साथ लगी किसी दूसरी डिवाइस में कार्ड के मैग्नेटिक टेप में सेव डाटा फीड हो जाता है.
बाद में उस डाटा का उपयोग खरीददारी के लिए किआ जा सकता है.
कार्ड से खरीददारी के वक़्त सतर्क रहें.

 कार्डिंग(फर्जी डेबिट कार्ड)

इसमें किसी के खोए हुए या चोरी किए गए कार्ड से ठगी होती है.
आपकी जानकारी हासिल होने के बाद अटैकर नया कार्ड बनाता है.
पहले इस फर्जी कार्ड के टेस्ट के लिए वह छोटा लेनदेन करता है.
इसके बाद आपके अकाउंट से बड़ी रकम निकल जाती है.
कार्ड खोने पर तुरंत बैंक में रिपोर्ट करें.



               अनसिक्योर ब्राउजिंग

ऑनलाइन बैंकिंग पब्लिक कंप्यूटर पर करने से आप फ्रॉड का शिकार हो सकते हैं.
कुछ साइबर कैफे आपका पासवर्ड और डीटेल्स अपने आप सेव कर लेते हैं, और आपको पता भी नहीं चलता.
बाद में वो इस जानकारी का उपयोग रकम निकासी के लिए करते हैं.
पब्लिक वाईफाई का प्रयोग बैंकिंग के लिए करने पर भी ऐसा हो सकता है.
बैंकिंग न करें और इसके लिए हमेशा अपने निजी कंप्यूटर का इस्तेमाल करें.


    एप-फिशिंग

कई एंड्राइड एप्लिकेशन्स आपके फ़ोन से डाटा चुरा सकती हैं.
अटैकर एक फेक app बनाता है जो दिखने में सिंपल सी लगती है.
लेकिन ये app आपके फ़ोन में टाइप की गई डीटेल्स उसतक पहुंचा देती है.
आपको अंदाज़ा भी नहीं लगता और आपका डाटा चोरी हो जाता है.
apps केवल एप-स्टोर से ही डाउनलोड करें.



        मोबाइल बैंकिंग

मोबाइल बैंकिंग का बढ़ता चलन इसकी वजह बना है.
पेटीएम और मोबीक्विक जैसी सेवाएँ सीधे बैंक खाते को मोबाइल से जोड़ देती हैं.
मोबाइल खो जाने पर इनसे पेमेंट आसानी से किया जा सकता है.
बहुत से अटैकर मोबाइल चोरी कर ऐसा करता हैं.
मोबाइल पर पासवर्ड लगाकर रखें और फोन खोने पर तुरंत रिपोर्ट करें.



 वायरस

कम्यूटर पर बैंकिंग करते वक़्त हैकर्स वायरस इंजेक्ट करने की कोशिश करते हैं.
ये वायरस उसे जानकारी देते हैं कि आप क्या टाइप कर रहे हैं.
आप सामान्य रूप से कंप्यूटर चलते हैं और आपको पता भी नहीं चलता.
इससे बचने के लिए ज़रूरी है कि कम्यूटर में फायरवाल ऑन रखें.
अपने एंटीवायरस सॉफ्टवेयर को अपडेट करते रहें.