Saturday, 5 May 2018

करीम चचा

  करीम चाचा

राम राम पंडित जी, अस्सलाम वालेकुम भाईजान,
हमारे मंदिर से आरती, तुम्हारे मस्जिद से अजान..
हमारे के हाथ में गीता, तुम्हारे हाथ में कुरान,
तुम्हारा अल्लाह हु अकबर, हमारा जय श्री राम।

हम हिंदुस्तान के हिंदू, तुम मुल्क-ए-हिन्द के मुसलमान,
क्या वाकई? यही, बस इतनी सी है हमारी पहचान?
इससे तो जानवर का बच्चा भी हमें बेहतर जान जाता है,
अरे दो आंखें, दो पैर, एक नाक, दो कान..
कमबख्त ये तो है इंसान...

हां हां, यही है वो इंसान जो पहले खुद को हिन्दू या मुसलमान बताता है,
फिर सामने वाले को हिन्दू मुसलमान बनाता है,
इसके बाद खुद को श्रेष्ठ और दूसरे को बुरा बताता है।
भूलकर की इंसान को बुरा मजहब नहीं, इंसान बनाता है।

दरअसल मैं एक कहानी लेकर आया था,
और शुरू कविता हो गई..
जैसे इंसान प्यार सिखाता धर्म और मजहब लेकर आया था,
और शुरू नफरत हो गई..

तो जो कहानी लाया था, वही सुनाऊंगा..

मोहल्ले से बाहर उस गली में सारे बड़े-बड़े मकान थे,
और उनकी शान में बट्टा बनती थी करीम चाचा की झोपड़ी,
यहां लोगों में प्यार था, बेशुमार था..
हर दिन नई सुबह.. नया त्योहार था..
करीम चाचा भी इसका हिस्सा थे और उन्हें मिलता हर छोटे-बड़े का प्यार था..

चचा के पास एक खजाना था, उनकी झोपड़ी के सामने अमरूद और आम के केवल दो पेड़ों वाला बाग था..
इस बाग में बच्चे खेलने आया करते थे..
और कसीदाकारी में माहिर करीम चाचा..
उनमें अपना बचपन ढूंढते.. मुस्कराया करते थे..

सब ठीक चल रहा था लेकिन एक रोज टीवी के रास्ते पहुंच गई यहां भी नफरत की आग,
कपड़े सिलने से लेकर बटन टांकने वाले करीम अब किसको आते याद,
बच्चों पर भी पाबंदियों का ऐसा लगा साया,
कई दिन बीत गए, उस बगीचे में.. उन पेड़ों पर कोई खेलने नहीं आया..

उस शाम दबे पांव झोपड़ी में मोहल्ले का.. मेरे ही जैसा चिंटू घुसा और उदास बैठे करीम से बिछड़े बच्चे सा लिपट गया..
अगले ही पल उसने पूछा.. चाचा आप बुरे हो क्या? आपने बीफ खाया है?
भारी आंखों से फूट पड़ा वो.. मानो आंखों से ढुलकते आंसू कह रहे हों..
मैं.. बुरा कब हुआ.. ये कैसा तूफान आया..
बोला बच्चे.. मैं बुरा नहीं हूं.. मैंने तो परसों से कुछ नहीं खाया..

ये बताओ.. दो दिन से कोई बच्चा खेलने क्यों नहीं आया?
क्योंकि सब कहते हैं आप मुसलमान हो.. आपने बीफ खाया है..
ये बीफ क्या होता है बेटा.. और क्या होता है मुसलमान?
तुम बच्चे ही तो मेरे अपने हो.. तुमहीं तो हो मेरा नूर मेरी जान..

चिंटू वापस घर लौट आया और सीधा अपने पापा से टकराया..
पापा.. आप क्यों नहीं जाने देते मुझे? करीम चाचा बुरे हैं.. ये झूठ हम बच्चों को क्यों सिखाया?
चुप रहो तुम.. मुसलमानों से दूर रहो!
नहीं हैं वो मुसलमान.. पापा, उन्होंने बीफ नहीं खाया..
आप बुरे हो-आपने झूठ बोला.. आपने मुझे उनसे नफरत करना सिखाया..

हैरान थे पापा.. और अगले दिन पूरा मोहल्ला हैरान था..
कि बच्चों को सही-गलत किसने समझा दिया?
करीम चाचा बुरे नहीं हैं, ये एहसास बच्चों ने बड़ों को दिला दिया..
आज किसी घर से टीवी के चीखते पर्दे की आवाज नहीं आ रही है..
बच्चे खेल रहे हैं बगीचे में.. करीम चाचा की हंसी और बच्चों की शरारत दूर से मुझे नज़र आ रही है..

इस वक़्त यहां न कोई हिन्दू-न मुसलमान है..
न किसी के हाथ गीता, न कुरान है..

तो हम भी बच्चा क्यों बन जाते,
मुझे लगता है आसान होगा दिल से बच्चा बन जाना..
क्योंकि अब मुश्किल हो चुका है,
इंसान को.. हिन्दू या मुसलमान नहीं..
इंसान कह पाना!

Sunday, 1 April 2018

अच्छे दिन आ गए मितरों... (व्यंग्य)

सुबह उठा तो पेड़ों पर चिड़िया 'अच्छे दिन आ गए' गा रही थीं। पैर जमीन पर पड़े तो मखमल का कालीन बिछा हुआ था, देसी टॉइलट की जगह 'स्वच्छ भारत' लिखा विदेशी कमोड लगा था जिसका जेट ऑन होते ही 'मित्रों' की आवाज़ कर रहा था। मेरी अलमारी में भगवा रंग के स्टाइलिश कपड़े जमे हुए थे और उनमें से सच्चे हिन्दू वाले चंदन की खुशबू आ रही थी। पहनकर बाहर निकला तो गड्ढा-मुक्त सड़कों पर कांग्रेस नेता पोंछा लगा रहे थे, वहीं कोने में पप्पू मंच से खाली मैदान में चुटकुले सुना रहे थे। राम मंदिर की पताका दूर लहराती नज़र आ रही थी और बैंक 'घर-घर मोदी' का नारा लगाने वालों को 15 लाख पहुंचा रहे थे।

इतनी देर में माथा घनचक्कर हुआ ही था कि देखा, मोदीनामी सूट पहने एक पत्रकार कैमरे के सामने मोदी महात्म्य सुना रहे थे। बता रहे थे किस तरह विजय माल्या ने तिहाड़ जेल में शादी रचाई है, नीरव और ललित मोदी सहित पूरी भगोड़ी फैमिली बारात लेकर आई है। आगे देखा तो मस्जिदों के गुम्बद भगवा पुते हुए थे, उनपर झंडे लगे थे और लाउडस्पीकर पर मोदी जी के मन की बात सुनाई दे रही थी। पता चला, भारत हिन्दू राष्ट्र बन चुका है.. बाकी धर्म वाले थोड़े पाकिस्तान, थोड़े बांग्लादेश, थोड़े कनाडा, थोड़े नार्थ-ईस्ट और थोड़े यूएस भेज दिए गए। बाकी बचे लोगों को बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया गया है, कुछ मार्गदर्शन मंडल में भी जमे हैं।

अमीर-गरीब सब एक से दिख रहे हैं, वही भगवा कपड़े पहने सेम 'नोटबन्दी' टाइप इस्माइल कर रहे थे। कहते हैं, सीमा सुरक्षा अब मुद्दा ही नहीं है क्योंकि आरएसएस की सेना बॉर्डर पर मोदी जी के भाषण चलाकर बैठ गई है। पाकिस्तानी कान के साथ-साथ बंदूक-तोप की नलियों में भी रुई ठूंसकर बैठे हैं। जेब से फोन निकालकर देखा तो फेसबुक पर लोकतंत्र खतरे में वाली पोस्ट भी 'लोकतंत्र' की तरह गायब थीं, क्रांतिकारी पत्रकारों के पैरोडी अकाउंट तक ब्लॉक हो चुके थे और जेएनयू की जगह मैप में अब 'देशभक्त निर्माण कार्यशाला' दिखा रहा था। हां! जिओ की ओर से मोदी जी की 12 मिस कॉल और 26 मैसेज पड़े थे। मैसेज में लिखा था, 'अच्छे दिन आ गए हैं मित्रों, इसे अपनी कॉलर टोन बनाने के लिए 420420 पर मिस कॉल दें, या सच्चे हिन्दू इस मैसेज को फॉरवर्ड करें!'

बड़ी मुश्किल से एक भाई साहब को पकड़कर विपक्ष कहां है का सवाल किया तो पता चला, 'विपक्ष के बचे खुचे घिसे पिटे 13 नेता महागठबंधन करके मोदी जी को हराने का मंत्र ढूंढने हिमालय पर चले गए हैं। बाकी साउथ इंडिया वाले कॉमरेड टाइप नेता किताबों के साथ खुद को बंद कर लाइब्रेरी में बैठे हैं। खैर, कांग्रेस को आरोपों की सफाई करते रहने और 'नेहरू की गलती है' सुनने के लिए रोक लिया गया है। देश में केवल सच्चे हिन्दू बचे हैं और बाकी सिकुलरों को 'कट्टर बनाओ मिशन' के तहत अमित शाह के पास सुधारगृह में भेज दिया गया है।'

मोदी जी कहां हैं वैसे? सवाल सुनकर हमसे खफा होते हुए भक्त बोला, 'हम सबमें मोदी हैं भाई! घर-घर मोदी, हर-हर मोदी.. अब तो अच्छे दिन आ गए, तुम भी तो मोदीनाम जपोगे? तुम चाहोगे तभी तो मेक इन इंडिया में हर कोई सच्चा हिन्दू बनेगा, वरना एक अकेला मोदी क्या-क्या करेगा?'

भाई मगर वो ऑरिजिनल वाले मोदी जी कहां.. बीच में ही टोककर भक्त बोला.. 'वो नया देश खोजकर आए थे न परसों, ट्रम्प के साथ उसका भूमिपूजन करने गए हैं.. मंदिर वहीं बनाएंगे!' और जो ये वाला मंदिर बना है वो? मैंने पूछा! 'तो आ रहे हैं न शाम को किम जोंग के साथ.. आरती मोदी जी ही तो कराएंगे! और हां, शर्त लगा लो, प्रसाद खाने राहुल बाबा भी आएंगे! हर हर मोदी..'

Saturday, 24 February 2018

नथिंग इमोशनल

कहने को बहुत कुछ है,
जताने बताने को है उससे भी ज़्यादा...
हैं केवल इमोशन्स दोनों ओर,
लेकिन #nothing_emotional का है वादा..

मिलना एक अजनबी से करना दोस्ती बस यूं ही,
समझाते हुए बस इतना कि मैं इमोशनल नहीं हूं।
समझना उलझनों को, सुलझाना अनबूझी पहेलियां,
फिर एक रोज जताना, मैं आज हूं-बीता कल नहीं हूं..

दूसरों के झगड़े निपटाते-सुलझाते, खुद घंटों बैठना साथ,
बिना बात की बात और बस यूं ही हाथों में हाथ।
सुनो! ये खत्म नहीं होना चाहिए, पूछा क्या तो बोली,
यही जो प्यारा सा रिश्ता है, ये जो बॉन्ड चल रहा है साथ।

बातों से चंद कदम साथ चलने और आने तक पास,
क्या समझ सके कब कौन हुआ किसके लिए खास।
लेकिन एक भूखा रहा, तो मर गई दूसरे की भूख-प्यास।
दो नहीं-चार आंखें छलकीं, जब कोई भी हुआ उदास।

इस तरह पास आना और एक दोस्त-एक साथी पाना,
आसान नहीं था, पर लगा जैसे जंगल में हाथी पाना।
कभी कंधे पर तो कभी गोद में सिर रखकर सो जाना,
सबको शक होने लगा, इस तरह हमने एकदूजे को माना।

हमारी दुनिया अलग थी, जहां थी चाय और कोल्ड कॉफी।
बेवजह फिरने की आदत, थी शाम वाली डांट और माफी।
यादें बटोरते और बांटते एहसास, रूठना मनाना रहा जारी।
सुबह-शाम साथ होकर भी लगा, कुछ बातें रह गईं बाकी।

बाकी रह गईं बातें और वक़्त आ गया लेने का विदा।
तेज नदी के एक किनारे तू, तो दूसरे किनारे जैसे मैं था।
ज़िद अब भी थी मिलने की, किनारों को मिलाता रहा।
तैरना न सीखा, डूबने की चाह में तेरे पास आता रहा।

हमारी यारी फिर जीती, और तुझे अपने साथ ले आया।
खत्म कर दिए दो किनारे, देख तुझे पक्के घाट ले आया।
मुमकिन तो नहीं होता दो दोस्तों का यूं साथ रहना,
लेकिन हम मिले क्योंकि तुझे यहां मेरा विश्वास ले आया।

रेत की टीलों से लेकर गीले पैरों और हवाई जहाज तक,
जीते रहे हैं एक अलग ज़िन्दगी साथ हम तो आज तक।
गर्म रसगुल्लों की मिठास से लेकर रेत की ठंडक तक,
और गंगा में तैरते दियों से लेकर बनारस के घाट तक।

यहां यादें बिखरी हैं, एहसास के मोतियों से टूटे हैं पल।
हमारा वजूद ही क्या है, यही बातें रहेंगी आज-कल।
हां पता है, चाहते हैं, हर दूरी-हर मुश्किल बस जाए टल...
फिर दोहराता हूं मेरी दोस्त.. #nothing_emotional

Saturday, 18 March 2017

डिजिटल होते इंडिया में खाली क्यों है साइबर स्पेस

                 एक डिजिटल होता देश भारत, जहां सब कुछ इंटरनेट पर उपलब्ध हो रहा है। डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा मिल रहा  है और सरकार से जुड़ी सभी योजनाओं की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध है। सोशल मीडिया के प्रयोग में भारत बेशक अव्वल नंबर पर हो लेकिन इसके बावजूद साइबरस्पेस में उसकी सहभागिता बहुत कम है और यह चिंता का विषय विषय है। डिजिटल होती सरकार और इंटरनेट पर आती जन योजनाओं के बीच यह समझना भी जरूरी है कि भारत में इंटरनेट सेवाएं किस हद तक मिल पा रही हैं। खासकर उन क्षेत्रों जहां मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो सकी है, वहां पर इंटरनेट का पहुंचना भारत के डिजिटल होने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। भारत का डिजिटल स्पेस या यूं कहें साइबरस्पेस बिल्कुल खाली दिख रहा है और ऐसे में सरकार या फिर देश के डिजिटल होने की बात बेमानी प्रतीत होती है। डिजिटल होने के प्रयास किए जाने चाहिए इसमें कुछ गलत नहीं लेकिन इसके लिए खुद को पहले तैयार करना होगा। भारत में अभी साइबरस्पेस का खाली होना यह दर्शाता है कि कहीं कुछ खामियां है जिन को दूर करना जरूरी है।
     साइबर स्पेस दरअसल  इंटरनेट पर लोगों की मौजूद होने से बनी आभासी दुनिया है जहां लोग ना सिर्फ विचार साझा करते हैं, बल्कि अपनी समस्याओं का हल भी तलाशते हैं। सोशल मीडिया साइट्स जैसे फेसबुक और ट्विटर साइबर स्पेस का एक बड़ा हिस्सा हैं। फेसबुक भारत में सबसे ज्यादा लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग साइट है इसका श्रेय स्मार्टफोन्स को भी जाता है। भारत में स्मार्ट फोन उपभोक्ताओं में कुल 72 प्रतिशत इंटरनेट पर का प्रयोग करते हैं। हम इस बात से भी इनकार नहीं कर सकते कि देश की लगभग आधी आबादी के पास स्मार्टफोन नहीं है।  देश में लगभग 35% एक्टिव इंटरनेट यूजर हैं, यानी कि बाकी करीब 60% से ज्यादा लोग इंटरनेट पर लगातार एक्टिव नहीं रहते और यहीं साइबरस्पेस में खालीपन दिखता है। 
     
        80 के दशक में भारत आए इंटरनेट को स्मार्ट फोन आने के बाद गति मिली। दुनियाभर के इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में भारत का हिस्सा करीब 13.5 प्रतिशत है। भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है लेकिन इंटरनेट प्रोवाइडर्स बेहतर स्पीड उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं। साथ ही सुदूर क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच अभी मुश्किल है और इसमें अच्छा खासा वक्त लगना बाकी है।  इंटरनेट का उपयोग करने के मामले में भारत दुनिया के कई देशों के मुकाबले निचले पायदान पर है, श्रीलंका और भूटान जैसे छोटे देश भी भारत से काफी आगे हैं। डिजिटल इंडिया मिशन को चुनौती देते हुए आईसीटी एक्सेस, आईसीटी यूज और आईसीटी स्किल मामले में 166 देशों में इंडोनेशिया, श्रीलंका, सूडान, भूटान और केन्या जैसे देशों के बाद अब भारत का स्थान 129वां है। वहीँ फिक्स्ड ब्रॉडबैंड पहुंचाने के मामले में हम 125वें स्थान पर हैं। सौ लोगों की आबादी पर केवल 1.2 ब्रॉडबैंड कनेक्शन है जबकि विश्व का औसत सौ लोगों पर 9.4 का है। विकासशील देशों के वर्गीकरण में भारत में ब्रॉडबैंड की पहुंच 13 प्रतिशत घरों तक है और हम 75वें स्थान पर हैं। दरअसल भारत की आबादी ज्यादा है और इंटरनेट सुविधा उपलब्ध कराने वाली कंपनियों ने अपनी क्षमता से ज्यादा उपभोक्ताओं को कनेक्शन बांट दिए हैं। ऐसे में उपभोक्ता जब इंटरनेट का उपयोग करते हैं तो दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में 2 केबीपीएस की स्पीड भी नहीं मिल पाती। ऐसे में इंटरनेट का उपयोग बढ़ने की उम्मीद नहीं की जा सकती। 
     स्मार्ट फोन आने से जो इंटरनेट उपयोग बढ़ा है, वह सभी उपलब्ध सेवाएं उपलब्ध नहीं करा पाता। 80 फ़ीसदी से ज्यादा उपभोक्ताओं को इंटरनेट की स्पीड चार से 6 केबीपीएस से ज्यादा नहीं मिल पाने से इसका उपयोग नहीं होता या फिर कम रहा है।  सारी दुनिया में जहां 4जी के बाद 5जी सर्विस शुरू हो गई है, वहीँ भारत में हम 2जी की 56 केबीपीएस की न्यूनतम स्पीड तक उपभोक्ताओं को उपलब्ध नहीं करा रहे हैं और 4जी सेवा का लाने का दावा कर रहे हैं। 
      भारत पर इंटरनेट के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए साइबर सुरक्षा का मुद्दा भी यक्षप्रश्न बनकर खड़ा है। हाल ही में लीजन के साइबर अटैक ने भारत में साइबर सुरक्षा की पोल खोल दी है। हमारे देश पर हो रहे इस साइबर अटैक के पीछे अनेक संस्थागत आर्थिक और सामाजिक कारण थे, लेकिन यह देश में इंटरनेट के प्रयोग पर सवाल खड़े करता है। इसके अलावा हमारी अतिगोपनीय सुरक्षाओं के लिए अपरिहार्य 'क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर' पर अभी तक काम नहीं हो सका है। सरकार के मेल सर्वर को राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र देखता है और अंतर्गत आने वाले उपभोक्ताओं ने अब इसके टू फ़ैक्टर ऑथेंटिकेशन पर भरोसा करने से मना कर दिया है। इसके जरिए  सरकार की गोपनीय सूचना तक पहुंचा जा सकता है। 2014 में एक राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा संयोजक की नियुक्ति की गई थी परंतु राज्यों के साथ उनके संपर्क को बनाए रखने के लिए अब तक अधिकारी नियुक्त नहीं हुए। कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम में भी कर्मचारियों का टोटा है। इंटरफेस और ई-कॉमर्स वेबसाइट के मामले में भी भारत में इलेक्ट्रॉनिक फ्रॉड होता रहा है। साइबर सुरक्षा को लेकर सरकार की उदासीनता ने इसे बढ़ावा दिया है। विमुद्रीकरण के बाद सरकार उपकरणों और लेनदेन की सुरक्षा बढ़ाई देना ही डिजिटल लेनदेन की मजबूरी को सामने रख दी है। उल्टा रिजर्व बैंक ने 2000 रूपए तक के ट्रांजैक्शन के लिए 'टू मींस ऑफ आइडेंटिफिकेशन' यानी कि 2FA की जरूरत को भी हटा दिया है। ऐसे में बड़े लेन देन को भी हैक किया जा सकता है। डाटा हैकिंग का सिलसिला इंटरनेट उपभोक्ताओं के विश्वास को तोड़ सकता है। 
         इंटरनेट पर सामग्री की उपलब्धता पर भी सवाल उठाया जा सकता है। हमारे देश में 2.6 करोड़ रजिस्टर्ड लघु और मध्यम उद्योग है जिनमें करीब छह करोड़ को रोजगार मिला है। इनमें से 30 फ़ीसदी भी ऑनलाइन नहीं है। तकरीबन 33 लाख गैर सरकारी संस्थाएं यानी एनजीओ हैं। इनमें से 70 फ़ीसदी से भी ज्यादा ऐसी हैं जिनकी साइबर दुनिया में मौजूदगी नहीं है। विकासशील देश भारत में निर्वाचित प्रतिनिधियों पर बात करें तो हमारे यहां पंचायतों के लगभग 28 लाख 10 हज़ार निर्वाचन क्षेत्र हैं, विधानसभाओं के 4126 और लोकसभा के 543 निर्वाचन क्षेत्र हैं केरल की पंचायत को छोड़ दें ज़्यादातर पंचायतों के पास अपनी कोई वेबसाइट नहीं है।  बहुत सी सरकारी वेबसाइट्स पर भी स्थानीय भाषा में जानकारी उपलब्ध नहीं यह भी साइबरस्पेस के खाली होने की एक वजह है। 
      भारत का एक तबका डिजिटल होने को पूरी तरह तैयार है और हो भी रहा है जबकि दूसरा एक बड़ा तबका वंचित है और चाह कर भी साइबरस्पेस में जगह नहीं बना पा रहा है। इंटरनेट सेवा को बेहतर करने, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, इंटरनेट प्रदाताओं पर लगाम लगाना और ट्राई द्वारा उनके लिए नियम और मानक तय करना भारत की साइबर स्पेस में उपस्थिति को मजबूत और ठोस रूप दे सकता है। भारत में सोशल मीडिया इंटरनेट का दूसरा नाम  बनकर न रह जाए इसके लिए प्रयास जरूरी हैं और हर स्तर पर होने चाहिए। इंटरनेट सेवाओं को बेहतर बनाना इस दिशा में पहला कदम होना चाहिए क्योंकि वेबसाइट बनने से ज्यादा जरूरी है लोगों का उन तक पहुंचना। भारत की ऑनलाइन मौजूदगी से न सिर्फ देश समृद्ध होगा बल्कि दुनिया भर का बाजार हमारे करीब आ सकेगा। खाली पड़े इस साइबर स्पेस को भरने का यही सही वक्त है क्योंकि डिजिटल इंडिया के साथ जरूरी है सबका साथ, सबका विकास और सबका इंटरनेट।