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Saturday, 24 February 2018

नथिंग इमोशनल

कहने को बहुत कुछ है,
जताने बताने को है उससे भी ज़्यादा...
हैं केवल इमोशन्स दोनों ओर,
लेकिन #nothing_emotional का है वादा..

मिलना एक अजनबी से करना दोस्ती बस यूं ही,
समझाते हुए बस इतना कि मैं इमोशनल नहीं हूं।
समझना उलझनों को, सुलझाना अनबूझी पहेलियां,
फिर एक रोज जताना, मैं आज हूं-बीता कल नहीं हूं..

दूसरों के झगड़े निपटाते-सुलझाते, खुद घंटों बैठना साथ,
बिना बात की बात और बस यूं ही हाथों में हाथ।
सुनो! ये खत्म नहीं होना चाहिए, पूछा क्या तो बोली,
यही जो प्यारा सा रिश्ता है, ये जो बॉन्ड चल रहा है साथ।

बातों से चंद कदम साथ चलने और आने तक पास,
क्या समझ सके कब कौन हुआ किसके लिए खास।
लेकिन एक भूखा रहा, तो मर गई दूसरे की भूख-प्यास।
दो नहीं-चार आंखें छलकीं, जब कोई भी हुआ उदास।

इस तरह पास आना और एक दोस्त-एक साथी पाना,
आसान नहीं था, पर लगा जैसे जंगल में हाथी पाना।
कभी कंधे पर तो कभी गोद में सिर रखकर सो जाना,
सबको शक होने लगा, इस तरह हमने एकदूजे को माना।

हमारी दुनिया अलग थी, जहां थी चाय और कोल्ड कॉफी।
बेवजह फिरने की आदत, थी शाम वाली डांट और माफी।
यादें बटोरते और बांटते एहसास, रूठना मनाना रहा जारी।
सुबह-शाम साथ होकर भी लगा, कुछ बातें रह गईं बाकी।

बाकी रह गईं बातें और वक़्त आ गया लेने का विदा।
तेज नदी के एक किनारे तू, तो दूसरे किनारे जैसे मैं था।
ज़िद अब भी थी मिलने की, किनारों को मिलाता रहा।
तैरना न सीखा, डूबने की चाह में तेरे पास आता रहा।

हमारी यारी फिर जीती, और तुझे अपने साथ ले आया।
खत्म कर दिए दो किनारे, देख तुझे पक्के घाट ले आया।
मुमकिन तो नहीं होता दो दोस्तों का यूं साथ रहना,
लेकिन हम मिले क्योंकि तुझे यहां मेरा विश्वास ले आया।

रेत की टीलों से लेकर गीले पैरों और हवाई जहाज तक,
जीते रहे हैं एक अलग ज़िन्दगी साथ हम तो आज तक।
गर्म रसगुल्लों की मिठास से लेकर रेत की ठंडक तक,
और गंगा में तैरते दियों से लेकर बनारस के घाट तक।

यहां यादें बिखरी हैं, एहसास के मोतियों से टूटे हैं पल।
हमारा वजूद ही क्या है, यही बातें रहेंगी आज-कल।
हां पता है, चाहते हैं, हर दूरी-हर मुश्किल बस जाए टल...
फिर दोहराता हूं मेरी दोस्त.. #nothing_emotional

Friday, 27 January 2017

अधूरी भिखारन

हेडलाइट्स की रोशनी मुझे सोने नहीं देती, गाड़ियों की आवाज की तो ऐसी आदत पड़ चुकी है कि एहसास ही नहीं होता लेकिन हेडलाइट्स की चमक मेरी पलकों के उस पार ऐसे रंग भरती है जैसे मेरी जिंदगी ने कभी नहीं भरे। फुटपाथ पर करवट बदलते कब सुबह हो जाती है पता ही नहीं चलता। अक्सर खुद से पूछती हूं मेरी जगह फुटपाथ पर क्यों! क्या सिर्फ इसलिए कि ऊपरवाले ने मेरे दोनों हाथ मुझसे छीन लिए, या फिर इसलिए क्योंकि मैंने अपनी किस्मत के आगे घुटने टेक दिए। नहीं! मैंने अपनी किस्मत को कभी अपनी ज़िन्दगी नहीं माना। दिन बीतते गए, आसपास सब बदलता गया लेकिन मेरी हालत वही रही,'भिखारन'। पहले भिखारन बच्ची और अब भिखारन लड़की।
           
मैंने सिर्फ एक रिश्ता देखा और समझा, जिसे सब नाम देते हैं 'मां'। मैं तो अम्मा कहती थी, खूब बात करती थी उससे। अम्मा के पास मेरे हर सवाल का जवाब होता था। हां, मैंने अम्मा से एक सवाल कभी नहीं पूछा कि मेरे पास हाथ क्यों नहीं हैं? वो उदास हो जाती थी जब भी कोई बात मेरे अधूरेपन को लेकर होती. उसने कभी मुझे अधूरा नहीं रहने दिया, एहसास दिलाती रही कि मैं अधूरी नहीं हूं. अदूरेपन के एहसास को छिपाया जा सकता है लेकिन झुठलाया नहीं जा सकता. मेरी मां सिग्नल पर रुकने वाली गाड़ियों के सामने हाथ फैलाती तो मैं वैसा भी न कर पाती, बस अम्मा के साथ रहती थी. मुझे देखकर लोगों के मन में आने वाली दया चंद सिक्कों में सिमटकर मां के हाथ पर खनक पड़ती थी. कुछ ऐसे मेरा बचपन बीत और बदलते वक़्त ने मेरी मां को बूढ़ा और मुझे जवान कर दिया, मेरा अधूरापन अब मुझे और भी सताने लगा. मां कमज़ोर हो चली थी और सिग्नल पर गाड़ियों के रुकने पर ढोलक बजाती थी. मैंने भी कुछ करतब सीख लिए थे, मेरे पैर मेरे हाथों की कमी पूरी करने लगे थे। मैंने गाड़ियों को रुकते देखा है, ये लंबी गाड़ियां मेरे करतब से ज़्यादा उस अनोखे जीव को देखने के लिए रूकती थीं जो बिना हाथों के भी पैर से हवा में रंग उकेरता था। मैं जैसे जैसे बढ़ रही थी, गाड़ियों में बैठे लोग नीचे गिरते जा रहे थे। काश मैं बच्ची ही रहती, तब लोगों की आंखों में जो दया थी उसकी जगह अब कुछ और दिखने लगा था। मासूम नहीं रही थी न मैं, समझने लगी थी। तेजी से बीतते वक़्त और उसके साथ बदलती नज़रों के बीच एक हादसा हुआ। मेरे अधूरेपन का एहसास मुझे उस रोज हुआ जब मैंने सबकुछ गंवा दिया। उस दिन अम्मा मेरे साथ सड़क पार कर रही थी। हमेशा की तरह मैं आगे चल रही थी और वो पीछे। पहला कदम फुटपथपर पड़ने के साथ ही जाने कैसे उसका पैर फिसल गया। जब मैं पीछे मुड़ी तो मैंने अम्मा को गिरते हुए देखा और अगले ही पल पीछे से आ रहे ट्रक ने उसे टक्कर मार दी। तेज़ रफ़्तार ने एक झटके में मेरी छोटी सी दुनिया ख़त्म कर दी। मुझे अच्छे से याद है, अम्मा ने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया था। यह जानते हुए भी कि मैं उसका हाथ नहीं थाम सकती, उस पल उसका हाथ मेरी ओर बढ़ा था। मैं कुछ नहीं कर पाई सिवाय रोने और चीखने के। पुलिस उसकी लाश उठाकर ले गई। क्यों , कहां, पता नहीं। छोड़ गई मुझे, मेरे घर, उसी फुटपाथ पर। 
             जबसे अम्मा गई, सबकुछ बदल गया। उसकी ढोलक अब भी वहीँ रखी है, मेरे अधूरेपन का मज़ाक बनाती है। अब मैं कोई करतब नहीं करती, सिग्नल पर पांव में पकड़ा कटोरा ऊपर उठा देती हूं। गाड़ी में बैठे लोगों को अब मुझपर दया नहीं आती, उनकी नज़रें मेरे सलवार के घिसने से हुए छेदों में झांकती हैं। उनकी नज़र मेरे दोनों कन्धों के बीच ऐसे रुक जाती है, जैसे मेरी ज़िन्दगी रुकी है। मांगती हूं सबसे क्योंकि मेरी नज़र में वो मुझसे बड़े हैं, अमीर हैं, लेकिन हर गुज़रती गाड़ी अपने साथ मेरा कुछ ले जाती है। मैं यहीं छूट जाती हूं, टूट सी जाती हूं। अरे !देखो न, सुबह हो गई। फिरसे रुकने लगी हैं गाड़ियां  उसी सिग्नल पर जहां बिकना नहीं चाहती मैं, फिर भी लोग मुझे खरीदना चाहते हैं। इसके बावजूद भी कि मैं 'अधूरी' हूं, 'भिखारन' हूं।

Thursday, 5 January 2017

लड़की मैं हूं! लेकिन अब डरना तुम्हें चाहिए...


                        पापा मुझे बाहर कम जाने देते हैं, रात में जल्दी घर आने को कहते हैं, पार्टी करने की छूट नहीं देते, अनजान लोगों से बात करने से मना करते हैं। क्या वो मुझसे प्यार नहीं करते? वो बुरे हैं, ओपन माइंडेड नहीं हैं? नहीं! वो बहुत अच्छे हैं, मुझे आगे बढ़ने देना चाहते हैं, उड़ते हुए देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें रोकटोक करनी पड़ती है। पता है क्यों! तुम्हारी वजह से। सही सुना, तुम्हारी वजह से। 
                 उन्हें पता है, मैं सूट पहनकर निकलूं, टॉप पहनूं या फिर हिज़ाब... तुम्हारी तिरछी और बेशर्म नज़रें मेरी माप लेना चाहेंगी, झांकना चाहेंगी मेरे कपड़ों के अंदर, नज़रों से आगे बढ़कर छूना भी चाहोगे मुझे, क्यों? लड़की हूं इसलिए! 
हर तरफ, हर जगह, हर वक़्त तुम्हारी बेशर्मी दिखती है। क्या मुझे डरना चाहिए? झूठ नहीं बोलूंगी, डर लगता है। जितना गुस्सा आता है उससे ज़्यादा डर लगता है। कह सकती हूं कि कमज़ोर नहीं हूं, आज़ाद हूं, निडर हूं। लेकिन मुझपर लगने वाली पाबंदियों की वजह भी अपनों का यही डर है। 
                क्या मुझे इसलिए डर लगता है कि मैं लड़की हूं? नहीं! बेशर्म... डर इसलिए लगता है क्योंकि तुम इंसान नहीं रहे। पड़ोस में रहने वाले अंकल से लेकर मुझे फेसबुक पर मैसेज करने वाले अनजान शख्स तक, सब छूना चाहते हैं मुझे, खा जाना चाहते हैं। इंसान नहीं रहे हो तुम अब। हवस, बेशर्मी और अश्लीलता तुममें इस कदर भर चुकी है कि शायद अपनी मां के सूखते कपड़े देखकर भी तुम्हारा मन मचल जाता हो। मानसिकता को दोष नहीं देना, तुम भी पल्ला झाड़ लोगे। मानसिकता तुम्हें नहीं, तुम उसे वाहियात बनाते हो। चार महीने की बच्ची से लेकर 84 साल तक की बुज़ुर्ग तक सबमें तुम्हें दिखते हैं अंग। नहीं दिखती ज़िंदगी, नहीं दिखता एक मन। बस टूट पड़ना है तुम्हें, नोच लेना है मुझे। 

               कभी महसूस किया है ये डर। जब कोई बिना तुम्हारी मर्ज़ी के तुम्हें छुए, मसल जाए। सिर्फ तुम्हारा शरीर ही नहीं, मन भी दर्द से चीख उठता है। खुदसे नफरत होने लगती है, हज़ार बार धुलती हूं लेकिन वो घिनौना एहसास नहीं धुलता। शर्म नहीं आती तुम्हें, इंसान जो नहीं हो। मुंह पर शराफत का मुखौटा लगाए तुम्हें भी बस मौके की तलाश है। मैंने कुछ नहीं किया, तो पूरा बोलो न! मौका मिलेगा तो चूकूंगा नहीं। 
                 अब वक़्त तुम्हारे डरने का है। तुम्हें किसी मर्द ने नहीं जना, किसी मर्द से शादी नहीं हुई है, कोई मर्द राखी नहीं बांधता। कैसे यकीन दिलाओगे खुदको। जब तुम्हारी बेटी स्कूल जाएगी, तो तुम्हारे जैसा घिनौना टीचर खेल के नाम पर उसके कपड़ों में हाथ नहीं डालेगा। जब शाम को मां बाजार जाएगी तो उसे तुम जैसे भेड़िए दबोच नहीं लेंगे। भैया कोचिंग जा रही हूं बोलकर जाने वाली बहन को तुम्हारे जैसा हैवान गाड़ी में नहीं खींच लेगा। हर कोई तुम जैसा ही दरिंदा है अब, किस-किस से बचाओगे। अब तो डरना शुरू कर दो। 
                 ओह! तो तुम भी पाबंदियां लगा दोगे। बहन अकेले बाहर नहीं जाएगी, बेटी को पढ़ने और मां को बाजार नहीं भेजोगे। अच्छा, मर्यादा के नाम पर कितना जकड़ोगे मुझे। खुद मर्यादा का मतलब समझ सकते, तो बेहतर होता। जंज़ीरों में जकड़ा है न मुझे। अब सब ठीक रहेगा। रात में क्यों निकली, तो क्या दिन में बलात्कार नहीं होते? छोटे कपड़े क्यों पहने, तो हिज़ाब पहने लड़कियों को कोई नहीं घूरता? जवान लड़की बाहर क्यों निकली, बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं का रेप नहीं होता? 
                  बेवकूफ! तुम्हारी तर्कशक्ति मर चुकी है। पागल हो चुके हो तुम। मेरी ज़रुरत है न तुम्हें? अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए। तो मुझे ज़िंदा तो रखना पड़ेगा, बचाकर रखना पड़ेगा। अरे मुझे बचाने वाले भी तुम हो और नोचने वाले भी। पाबन्दी की ज़ंजीरें और कसते जाओगे। इसी डर की वजह से, जो तुमने पैदा किया है। अगर यूं ही कसती जाएंगी पाबन्दी की ज़ंजीरें तो मर जाऊंगी मैं, लेकिन मुझसे पहले तुम मरोगे। कमसे कम इस डर से तो डरो। मुझे मत बचाओ, खुद को बचाओ। वरना आओ, खा लो मुझे, नोच लो। मुझे मारो और तुम भी बदतर मौत मरो।

Wednesday, 30 November 2016

ठण्ड की वो शाम.. खाली बेंच और इंतज़ार

               उस शाम वो बसस्टॉप की ठंडी बेंच पर चुपचाप बैठा था। खाली, एकदम खाली। मन में ढेर सारे विचारों का गुबार सा उठ रहा था, लगातार कुछ सोच रहा था वो। उसे खुद इस बात का एहसास नहीं था कि बेंच पर बैठे एक घंटे से ज़्यादा वक़्त बीत चुका है और अंधेरा धीरे-धीरे घना होता जा रहा है। दरअसल वो खुद भी उलझा हुआ था, खुदसे ये पूछने में कि उसे क्या सोचना चाहिए और क्यों। विचार आते जा रहे थे और वो किसी मंझे हुए फुटबॉल खिलाड़ी की तरह उन्हें लात मारता जा रहा था। आखिर वह कर क्या रहा था, इस एक विचार को लात मारने ही वाला था कि रुक गया। हां! मैं क्या कर रहा हूं यहां? इतनी ठण्ड में। सामने एक बस खड़ी थी और उसकी खाली बेंच से दूर कुछ सवारियां बस के चलने के इंतज़ार में थीं। 'इंतज़ार', यहीं पर आकर आज थम गया वो। वो न तो कुछ करने आया था और न ही कुछ कर रहा था लेकिन अब उसके पास भी करने को कुछ था। ये कुछ था, इंतज़ार!
         उसने इंतज़ार करने का मन बनाया। किसी बस का नहीं, किसी इंसान का नहीं, किसी सपने, किसी चीज़ का नहीं। खुद का और इन विचारों के रुकने का इंतज़ार। अब उसे बेंच पर घंटों बैठने का मकसद समझ आ रहा था, वो भी तो इंतज़ार कर रहा था। वो बस सोचता जा रहा था, शायद खुद को तसल्ली देने के लिए सबसे आसान होता है इंतज़ार। हम किसी का करते हैं और कोई हमारा। इंतज़ार करने का ख्याल मन में आता ही किसी ज़रुरत के बाद है। हमें किसी की ज़रुरत हो और वो पास न हो तो इंतज़ार शुरू हो जाता है। हमें कुछ चाहिए और मिल नहीं पा रहा, क्या करेंगे इंतज़ार के अलावा। कई बार तो हमें भी नहीं पता होता हम किसका इंतज़ार कर रहे हैं, पर एक खालीपन होता है जिसे भरने की चाहत इंसान से लंबा इंतज़ार करवाती है। इंतज़ार करना विकल्प नहीं, ज़रुरत नहीं, मज़बूरी है। किसे अच्छा लगता है एक पल भी इंतज़ार करना, पर क्या करें करना पड़ता है।
       कभी सोचा है अगर इंतज़ार ही न हो तो! बेबस हो जाएगा इंसान। या तो बेचारा बन जाएगा या तो ताकतवर। तो कई बार इंतज़ार ज़िन्दगी भर का हो जाता है, कई बार ख़त्म हो जाता है। इंतज़ार जितना लंबा हो तक़लीफ़ उतनी बढ़ती जाती है। पर कोई क्या करे अगर इंतज़ार करते-करते अरसा बीत जाए और कोई न आए, क्या करना चाहिए उसे। खुद से यह कहना चाहिए कि बस अब और नहीं और ख़त्म करना चाहिए इंतज़ार, लेकिन सिर्फ तब जब खुदपर यकीन हो जाए। जब पता हो कि अब मुझे उसकी ज़रुरत ही नहीं जिसका मैं इंतज़ार करता रहा तो यही सही वक़्त है इंतज़ार ख़त्म करने का।
         उसके सामने से एक के बाद एक बसें गुज़र रही थीं, क्योंकि हर स्टॉप पर लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे। लोग बस का इंतज़ार कर रहे थे क्योंकि कोई उनका इंतज़ार कर रहा था। बेंच खाली है फिर भी कोई सवारी उसपर नहीं बैठती, इसकी वजह भी इंतज़ार है। इंतज़ार भी ऐसा जो चैन से बैठने नहीं देता, सुकून नहीं मिलने देता। बस खाली है फिर भी उन्हें जल्दी चढ़ना है जिससे उनका इंतज़ार जल्दी ख़त्म हो। इंतज़ार भी जब हद से ज़्यादा बढ़ जाए तो परेशान कर देता है।
         इंतज़ार करने वाले को ज़रुरत पूरी होने से ज़्यादा उसे पूरा करने वाले का इंतज़ार होता है क्योंकि अक्सर लोग यह समझने की भूल कर बैठते हैं कि उस एक चीज़ के अलावा ज़रुरत पूरी करने के लिए कोई विकल्प नहीं। वो उन परेशान चेहरों को देख रहा था जिन्हें उनकी बस का इंतज़ार था, बार-बार सड़क के दूसरे छोर को देख रहे थे। किसी भी बड़ी बस को आता देख उम्मीद बांध लेते थे और पास आकर वो निराश कर जाती थी। उन्हें सिर्फ अपनी उसी बस का इंतज़ार था जो उनका इंतज़ार कर रहे दूसरों का इंतज़ार ख़त्म कर सके। सामने खड़े ऑटो को सारे ऐसे नज़रंदाज़ कर रहे थे मानों वो वहां हों ही नहीं। इंतज़ार तो उन्हें बस का था न! भूल ही गए थे वो कि शायद आधे घंटे से अपनी बस का इंतज़ार करने से बेहतर होगा ऑटो से जल्दी जाकर बाकियों का इंतज़ार ख़त्म करना।
       उफ़! कितना उलझे हुए हैं सब आपस में, उसने खुदसे पूछा। अच्छा लगने लगा उसे यह सोचकर कि उसे किसी बस का इंतज़ार नहीं करना क्योंकि किसी को उसका इंतज़ार नहीं और उसे कहीं जाने की जल्दी नहीं। उसकी यह खुशी अचानक फीकी पड़ गई, चेहरे का रंग उतर गया और आंखें भर आईं। कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा, क्या सच में! पिछले तीन घंटे में किसी ने नहीं पूछा कहां हो, आ जाओ न। मोबाइल की स्क्रीन भी सिर्फ वक़्त बता रही थी, कोई मैसेज नहीं था वहां। इसका सीधा मतलब तो यह हुआ कि किसी को उसको ज़रुरत ही नहीं। उसे गुस्सा भी आया और रोना भी, मन बना लिया कि अब इस बेंच से तब तक नहीं जाएगा जब तक कोई उसे बुलाता नहीं।
         वक़्त बीत रहा था और उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। क्या सच में किसी को उसकी ज़रुरत नहीं, यह सच वो मानने को तैयार ही नहीं था। इससे पहले कि पलकों पर ठहरे आंसू बाहर आने की जगह बना पाते, अचानक वह हंस पड़ा। इस हंसी की वजह थी उसकी अपनी नादानी। इंतज़ार के बारे में सोचते-सोचते वो खुद इसके चंगुल में फंसकर गंवा बैठा था अपना चैन। वो भी तो इंतज़ार करने लगा था किसी के फ़ोन का, किसी मैसेज का, किसी के ये कहने का कि जल्दी आ जाओ, तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं। बेवकूफी और बेफिक्री से उसने अपने आसपास देखा। बेंच, लोग, बसें और उनका इंतज़ार। समझने लगा था वो।
    किसे पता था वो यहां आएगा, बैठेगा और इंतज़ार के बारे में सोचेगा। शायद यह जगह उसका इंतज़ार करती रही हो, इस बेंच को उसका इंतज़ार रहा हो। अगर न भी रहा हो तो क्या उसे इसलिए यहां नहीं होना चाहिए था कि यहां कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा था। वह अपनी नादानी पर हंस रहा था।
       उसे अब किसी का इंतज़ार नहीं बनना था, क्योंकि खुद भी किसी का इंतज़ार नहीं करना था। इतना मतलबी नहीं था वो कि सिर्फ लोगों का इंतज़ार ख़त्म कर उनकी ज़रूरतें पूरी करे। उसे हर उस जगह रहना था जहां वह उन लोगों को हंसी बांट सके जो परेशान हैं और जिन्हें किसी और इंतज़ार की वजह से चैन-सुकून नहीं मिल रहा। वो हर किसी के साथ था, मदद कर सकता था। उसे कोई जल्दी भी नहीं थी क्योंकि कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा था। अब उसका खुदका इंतज़ार भी ख़त्म हो चुका था, वो तो उसके मन में था ही नहीं। अब वो इस जगह से जाने को तैयार था, सचमुच तैयार। बढ़ते अंधेरे ने उसके मन में उजाला कर ही दिया था। चलने को तैयार, मुस्कराकर वो बेंच से उठा और पीछे मुड़कर बोला, 'सुनो! मेरा इंतज़ार मत करना।'

Saturday, 26 November 2016

मेट्रो सा मन मेरा,कुछ पल ठहरा पर चलता ही रहा


               दिल्ली में कहीं ज़मीन से ऊपर तो कहीं ज़मीन से नीचे दौड़ती मेट्रो, जिसे राजधानी की जीवन रेखा भी कहा जाता है, अपनी अलग जगह बना चुकी है। जब मैं पहली बार दिल्ली आया तो सबसे ज़्यादा रोमांचक मेरे लिए मेट्रो का सफर रहा। अब यह  रोमांच मेरी ज़रुरत बन चुका है और मेट्रो मेरी दोस्त। मेट्रो से अब ऐसा लगाव हो चुका है कि खुदमें इसको ढूंढने लगा हूं। मैंने पाया है मेट्रो को.. मुझमें। 
         मेट्रो मेरा मन है, जो बस चलता ही जाता है। उसी रफ़्तार से, उसी सीधे रास्ते पर, जहां से होकर जाता है मेरी ज़िन्दगी का सफर। एक के बाद एक आनेवाले स्टेशन मेरी ज़िन्दगी के पड़ाव होते हैं और इसमें चढ़ने वाली सवारियां मेरी यादें। यादें, कुछ अच्छी, कुछ बुरी, कुछ कमज़ोर, कुछ ताकतवर, अलग-अलग तरह की ढेर सारी यादें। यूं तो हर याद सुरक्षा जांच के बाद ही मेरे मन में जगह बनाती है, लेकिन इसके बावजूद भी कुछ ऐसी यादें अंदर आ ही जाती हैं जो आसपास की दूसरी यादों को भी परेशान कर देती हैं। अक्सर सोचता हूं काश! मैं खुद चुन सकता कि कौन सी याद मेरे मन में जगह बनाएगी और कौन सी नहीं। लेकिन मेरी मर्ज़ी नहीं चलती, जो याद पहले आती है जगह पाती है और मेरा हिस्सा बन जाती है। दरवाज़े बंद करके चल पड़ता है मन अगले पड़ाव की ओरक्योंकि ज़िन्दगी कभी नहीं रुकती। 


           जब मेट्रो ज़मीन से नीचे चलती है तो मन मानो शांत होता है। न यादों को बाहर की तेज़ धूप या यूं कहूं दुनिया वालों की नज़र का एहसास होता है और न फ़िक्र। जब मेट्रो सा मन लोगों की नज़र में आने लगता है और यादों को नज़र लगने का डर रहता है तो मेरी भावनाओं की ठंडक उसकी यादों को परेशान नहीं होने देती। इन यादों को सुरक्षित समेटे और समझदारी का अनाउंसमेंट सुनाते बढ़ता जाता है मन। 
              न तो मैं रुका और न ही इन यादों को कभी रोकने की कोशिश की। नई यादों को जगह देने के लिए पुरानी यादों को जगह खाली करनी ही होती है। पुरानी यादें छोड़ता चलता हूं क्योंकि कई बार यह भी ज़रूरी हो जाता है। एक पल ऐसा भी आता है कि मन की मेट्रो में यादों के लिए जगह नहीं बचती और मैं दरवाजे बंद कर लेता हूं। छोड़ देता हूं बाकी यादों को पीछे। यादों की भीड़ मुझमें जगह बनाने की भरसक कोशिश करती है, लेकिन क्या करूं सारी यादें तो नहीं बटोर सकता। यह भी सोचता हूं कि शायद कोई अच्छी या फिर ऐसी याद पीछे रह गई हो जिसे मेरी ज़्यादा ज़रुरत थी। कहते हैं जो पीछे छूट जाए उसके बारे में सोचकर दुखी होने से अच्छा है कि आगे आने वाले पड़ावों से यादें साथ ले ली जाएं, मैं भी  यही करता हूं। 
                   मेट्रो की लाइनें और उनके रंग याद दिलाते हैं जिंदगी के रंगीन पहलू। लाल मेरा प्यार, पीला मेरी दोस्ती और नीला मेरा परिवार। सफर में राजीव चौक सा एक पड़ाव ऐसा भी आता है। जब ये तीनों लाइनें आपस में मिलती है और इतनी ढेर सारी यादें पास होती हैं कि उलझन सी होती है। दोस्ती, परिवार और प्यार के बीच अंतर कम हो जाता है। कई बार तो यादें भी नहीं समझ पातीं कि उन्हें दोस्ती वाली लाइन में जाना है या प्यार वाली। लेकिन इस सबसे अलग मेट्रो चलती रहती है। राजीव चौक ही क्यों न हो, यादों के पास ज़्यादा वक़्त नहीं होता, उन्हें भी पता होता है कि अगर छूट गईं तो लंबा इंतज़ार करना होगा। 
           मेरे मन की मेट्रो जैसे-जैसे आखिरी स्टॉप या यूं कहूं मेरी मंज़िल तक पहुंचती जाती है, पुरानी यादें तो पीछे छूटती चलती ही हैं, नई यादें भी कम जगह बनाती हैं। मंज़िल पर पहुंचकर मैं बिल्कुल खाली हो जाता हूं लेकिन मन का खालीपन वापस भरने का मन करता है। मैं लौटना चाहता हूं वापस उसी सफर पर, उन्हीं पड़ावों पर। समेटना चाहता हूं यादें एक बार फिर। मैं ठहरता जरूर हूं पर रुकता नहीं, क्योंकि मैं मेट्रो हूं, मन हूं। अरे हां, मेट्रो सा मन हूं।

Monday, 3 October 2016

बदल रहा हूं...

क्या कभी खोए हो तुम,
भीड़ में अपनों के बीच!
कभी रोये हो तुम,
या कभी टूटकर सोए हो तुम।

शायद नहीं, पर मैं रोता हूं...
इसलिए नहीं कि खोना नहीं चाहता।
इसलिए नहीं, कि बिखरे मोती पिरोना नहीं चाहता।
इसलिए, क्योंकि हर बार ये माला टूट जाती है।
बिखर जाते हैं मोती फिर से, आस छूट जाती है।

चुनौतियां पसंद हैं मुझे, मिलती ही जाती हैं।
एक पल मुस्कराकर, ज़िन्दगी फिर रूठ जाती है।
खुद को साबित करते करते, बहुत थक जाता हूं।
भर आती हैं आंखें जब, मुस्कराकर छुपाता हूं।

जी रहा हूं ज़िन्दगी, या फिर ये मुझे जी रही है।
यादों के परदे का वो छेद, उम्मीदें सी रही हैं।
सच्ची और झूठी बातें अब तक एक सी रही हैं।
आंखों का नहीं पता, आंसू क्यों पी रही हैं!

सच और झूठ के इस फेर से अब निकल रहा हूं,
भारी हैं कदम, बढ़ते नहीं, फिर भी चल रहा हूं।
कभी-कभी ऐसा लगता है खुद को ही छल रहा हूं,
या फिर क्या सच में, 'मैं बदल रहा हूं।'
-: प्राणेश तिवारी 

Friday, 23 September 2016

'मैं लड़की हूं'

माना मैं एक लड़की हूं,
पर हूं तो एक इंसान।
क्या फ़र्ज़ नहीं बनता है तुम्हारा,
कि करो मेरा सम्मान...

भोली हूं मैं, नादान हूं।
पर क्या यही मेरी गलती है!
मुझे बेजान समझना, और खेल जाना मुझसे।
इससे तुम्हें क्या ख़ुशी मिलती है?

दोस्त माना था तुम्हें, साथी माना था।
मुस्कान तुम्हारी सच्ची लगी, ऐसे पहचाना था।
पर क्या पता था, तुमने एक मुखौटा लगाया है।
अपने बेशर्म चेहरे को भोलेपन से छुपाया है।

मैंने नहीं दिया हक़ किसी को, जो चाहे जताने का।
मेरे बारे में कुछ भी बोलने का, मज़ाक बनाने का।
पर फिर भी ऐसा करते हो, तो शर्म करो इंसान हो।
शक होता है अब मुझको भी, तुम मानस की संतान हो।

तय करते हो मेरा चरित्र और नाम मुझे तुम देते हो।
एक पल में मन में अपने तुम, जो चीर मेरा हर लेते हो।
कायर हो, तुम हो बेईमान, काश ये खुद को समझाओ।
बेहतर होगा चुल्लू भर पानी में डूबो और मर जाओ।
                           
                                             : प्राणेश तिवारी

Thursday, 22 September 2016

'उधार'

शायद उधार अभी बाकी है,
नहीं पैसे नहीं! ना कोई सामान!
बाकी है तुम्हारे पास फिर भी बहुत कुछ मेरा।
याद रहेगी साथ बीती शाम, साथ हुआ सवेरा।

यूं तो मैं देता नहीं हर किसी को वक़्त अपना,
दिया तुम्हें, देखा तुम्हारे साथ, तुम्हारा सपना।
कर सकोगे वापस वो वक़्त मुझे!
कहां से लाओगे वो पल जो चले गए?

हां, सिर्फ मैं ही नहीं तुम भी तो कर्ज़दार हो।
ऐसा लगता है मुझपर कम तुमपर ज़्यादा उधार हो।
बांटे थे जो आंसू तुम्हारे, वापस नहीं मांगूगा।
पर खुद से वादा है, अब किसी का दर्द नहीं बांटूगा।

क्या वो तुम ही थे जो कंधे पर सिर झुकाकर रोए थे,
हां तुम ही तो थे जो मुझे दोस्त मान बेफिक्र सोए थे।
याद है न! कि ये भी भूल गए हम साथ थे।
अंधेरे रास्ते पर हाथों में हाथ थे, जज़्बात थे।

बहुत भोले हो मेरे दोस्त अच्छे से जानता हूं।
पर यह भी सच है कम लोगों को अपना मानता हूं।
तुम उन्हीं कम लोगों में से एक थे, क्योंकि नेक थे।
समझ जाना था पहले ही तुम्हें, पर समझे देर से।

हां! बुरा हूं मैं! जल्दी रूठ जाता हूं।
आवाज़ नहीं आती फिर भी टूट जाता हूं।
रोता हूं अकेले में पर सामने गुस्सा दिखाता हूं।
एक बार गया तो लौटकर वापस नहीं आता हूं।

-: प्राणेश तिवारी

Sunday, 8 May 2016

'माँ तू कहाँ है!'

सोचा आज माँ पर कविता लिखूं,
लिखने बैठा तो समझ न आया क्या लिखूं!

लिखूं उसके प्यार का गीत,
या त्याग की कहानी लिखूं।
हर खुशी है जिसकी मुझसे,
क्या उसकी ज़ुबानी लिखूं।

लिखूं ममता का आँचल,
गोद में मिलने वाला चैन लिखूं।
बीमार और बेचैन था जब,
तब क्यों भीगे उसके नैन लिखूं।

लिखूं वक़्त जो मेरे नाम किया,
जो दिया मुझे वो प्यार लिखूं।
लिखूं उसने चाहा मुझे कितना,
या फिर इसका आभार लिखूं।

क्यों लिखूं उस रिश्ते की कहानी चंद शब्दों में,
जिसे बयां करने को सारी ज़िन्दगी अधूरी है।
जिससे हूँ जिसका हूँ और जिसके लिए हूँ मैं,
कोई और नहीं एक 'माँ' वो मेरी है।

और हां!
हमारे इस जहाँ में, एक उनका भी जहाँ है,
जिन मासूमों को नहीं उनकी माँ का पता है।
हम आज शान से कहते हैं, मेरे पास माँ है!
वो बच्चे आज भी पूछ रहे,'माँ! तू कहाँ है?'

-: प्राणेश तिवारी (स्वरचित)