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Saturday, 24 February 2018

नथिंग इमोशनल

कहने को बहुत कुछ है,
जताने बताने को है उससे भी ज़्यादा...
हैं केवल इमोशन्स दोनों ओर,
लेकिन #nothing_emotional का है वादा..

मिलना एक अजनबी से करना दोस्ती बस यूं ही,
समझाते हुए बस इतना कि मैं इमोशनल नहीं हूं।
समझना उलझनों को, सुलझाना अनबूझी पहेलियां,
फिर एक रोज जताना, मैं आज हूं-बीता कल नहीं हूं..

दूसरों के झगड़े निपटाते-सुलझाते, खुद घंटों बैठना साथ,
बिना बात की बात और बस यूं ही हाथों में हाथ।
सुनो! ये खत्म नहीं होना चाहिए, पूछा क्या तो बोली,
यही जो प्यारा सा रिश्ता है, ये जो बॉन्ड चल रहा है साथ।

बातों से चंद कदम साथ चलने और आने तक पास,
क्या समझ सके कब कौन हुआ किसके लिए खास।
लेकिन एक भूखा रहा, तो मर गई दूसरे की भूख-प्यास।
दो नहीं-चार आंखें छलकीं, जब कोई भी हुआ उदास।

इस तरह पास आना और एक दोस्त-एक साथी पाना,
आसान नहीं था, पर लगा जैसे जंगल में हाथी पाना।
कभी कंधे पर तो कभी गोद में सिर रखकर सो जाना,
सबको शक होने लगा, इस तरह हमने एकदूजे को माना।

हमारी दुनिया अलग थी, जहां थी चाय और कोल्ड कॉफी।
बेवजह फिरने की आदत, थी शाम वाली डांट और माफी।
यादें बटोरते और बांटते एहसास, रूठना मनाना रहा जारी।
सुबह-शाम साथ होकर भी लगा, कुछ बातें रह गईं बाकी।

बाकी रह गईं बातें और वक़्त आ गया लेने का विदा।
तेज नदी के एक किनारे तू, तो दूसरे किनारे जैसे मैं था।
ज़िद अब भी थी मिलने की, किनारों को मिलाता रहा।
तैरना न सीखा, डूबने की चाह में तेरे पास आता रहा।

हमारी यारी फिर जीती, और तुझे अपने साथ ले आया।
खत्म कर दिए दो किनारे, देख तुझे पक्के घाट ले आया।
मुमकिन तो नहीं होता दो दोस्तों का यूं साथ रहना,
लेकिन हम मिले क्योंकि तुझे यहां मेरा विश्वास ले आया।

रेत की टीलों से लेकर गीले पैरों और हवाई जहाज तक,
जीते रहे हैं एक अलग ज़िन्दगी साथ हम तो आज तक।
गर्म रसगुल्लों की मिठास से लेकर रेत की ठंडक तक,
और गंगा में तैरते दियों से लेकर बनारस के घाट तक।

यहां यादें बिखरी हैं, एहसास के मोतियों से टूटे हैं पल।
हमारा वजूद ही क्या है, यही बातें रहेंगी आज-कल।
हां पता है, चाहते हैं, हर दूरी-हर मुश्किल बस जाए टल...
फिर दोहराता हूं मेरी दोस्त.. #nothing_emotional

Thursday, 5 January 2017

बेटी! ये चिट्ठी तुम्हारे लिए...

प्यारी बिटिया,
                    शायद पहला ख्याल तुम्हारे मन में यही होगा कि मैं ये चिट्ठी अभी से क्यों लिख रहा हूं, जबकि मैं खुद पूरे 21 साल का नहीं हुआ। मेरी बच्ची, शायद आज से दस साल बाद हालात ऐसे न रहें। सुधर जाएं या फिर बदतर हो चुके हों, इसलिए यही सही वक़्त है तुम्हें बताने का कि जब तक तुम मेरी उम्र की होगी हमारा रिश्ता कैसा होगा।
          मैं चाहता था कि काश! मैं लड़की होता। हंसो नहीं बुद्धू, दिखा देना चाहता था सबको कि एक लड़की के तौर पर मैं कौन हूं। पलटकर जवाब देना चाहता था सबको। लड़का हूं तब भी जवाब दिए, फटकार लगाई, आवाज़ उठाई, लेकिन एक सच को नहीं झुठला पाया कि मैं लड़की नहीं हूं और मैं लड़की होने का दर्द नहीं जानता। बस देख सकता हूं लड़कियों की तकलीफ, उसे महसूस नहीं कर सकता। पता है, मुझे अपने जैसा बेटा नहीं, तुम्हारे जैसी बेटी ही चाहिए थी।
    
   क्या लड़की होना सिर्फ दर्द और तक़लीफ़ देता है! नहीं मेरी बच्ची, कोई दर्द नहीं झेलोगी तुम, कोई तकलीफ नहीं होगी तुम्हें। कोई पाबन्दी, कोई रोकटोक नहीं झेलोगी तुम। बचपन में गैस और बर्तनों से भी खेलोगी और डॉक्टर की किट से भी। बन्दूक से भी खेलना और गुड़िया से भी, लेकिन तुम अपनी गुड़िया की शादी नहीं रचाओगी, उसे पढ़ाओगी और लड़ना सिखाओगी। बचपन में तुम्हें कमज़ोर होने का झूठा एहसास नहीं दिलाऊंगा, तुम सब कुछ कर सकती हो, यह बताऊंगा।
         मेरी बच्ची! स्कूल में अक्सर तुम्हें लड़की-लड़की सुनने को मिल जाएगा। शर्माना नहीं, गर्व महसूस करना। हंसी आए तो छुपाकर नहीं, खिलखिलाकर हंसना। सबसे बात करना, खूब सवाल करना। कुछ भी कहने में संकोच मत करना। कोई लाख समझाए क्या सही है क्या गलत, कोई सीमा रेखा नहीं होगी तुम्हारे लिए। लड़की हो, ये मत करो, वहां मत जाओ! खूब चीखेंगे लोग, उनकी एक मत सुनना। बेफिक्र भागना, दौड़ लगाना, उड़ने की कोशिश करना। घर आकर मुझे सारी कहानियां सुनाना और हम साथ ठहाके लगाएंगे।
          जब तुम ऐसा करने लगोगी न! लोगों को परेशान होते और तिलमिलाते हुए देखोगी। तुम्हारा हर आज़ाद कदम उनको अखरेगा और ऐसे में अगर कोई तुम्हारा हाथ पकड़कर आगे बढ़ने से रोके, अपनी पूरी ताकत से घूंसा मारकर उसका मुंह तोड़ देना। कभी कोई तुमसे लड़ पड़े, तो रोने मत लगना, न तो पापा से शिकायत कर दूंगी कहकर भाग आना। तुम्हें लगता है तुम सही हो, तो बस डटी रहना, हार मत मानना।
           मैं अभी जितना बड़ा हूं, जब तुम इतने की हो जाओगी, सब बदल जाएग। जब तुम रास्ते में निकलोगी, लोग तुम्हें घूरेंगे। नज़रें मत चुराना, उनकी आंखों में आंखें डालकर उन्हें घूरना और एहसास दिलाना कि तुम कौन हो। कोई बोले तुमसे, इसका इंतज़ार किए बगैर ही उसे करारा जवाब देना। अगर किसी की हिम्मत आगे बढ़कर तुम्हें छूने की हो तो कदम पीछे मत खींचना, आगे बढ़कर ऐसा वार करना कि उसे भी ज़िन्दगी भर याद रहे। बाकी एक और ऑप्शन है, तुम चाहो तो एक छोटी हथौड़ी अपने पर्स में रख लेना। ओहो! इसलिए नहीं कि तुम डरती हो, इसलिए जिससे सिर फोड़ने में आसानी हो। अपनी ओर उठने वाली हर नज़र से नज़र मिलाकर उसे शर्मसार करना। तुमपर कोई वार करे तो भागने के बजाय उसपर दोगुनी तेजी से वार करना। उसका सिर ज़रूर फोड़ना!
        जब तुम इतनी हिम्मत करने लगोगी मेरी बच्ची, सब तुमको लेकर राय बनाएंगे। तुम्हारे चलने, बैठने और बोलने के तरीके से भी उन्हें दिक्कत होगी। तुम किसी की एक मत सुनना, जैसा चाहो रहना। तुम्हारे कपड़े भी उन्हें अच्छे नहीं लगेंगे, लेकिन इतना पता है, उनकी सोच से ज़्यादा छोटे नहीं होंगे। कभी मत सुनना उनकी मेरी बच्ची, अपनी सुनना। डरने की गलती मत करना, डरकर सौ साल जीने से बेहतर होगा एक आज़ाद दिन जीना। अपने लिए ही नहीं, सबके लिए जीना। मुझे पता है तुम यह सोचकर आगे नहीं बढ़ जाओगी कि गड़बड़ है भी तो क्या, मेरे साथ तो नहीं। हर दोस्त के लिए लड़ना, हर अंजान के लिए, हर लड़की के लिए लड़ना। आवाज़ उठाना और अगर कोई न सुने तो हथियार उठाने में वक़्त मत लगाना।
        मैं ये नहीं कहूंगा कि खुदपर भरोसा है जो तुम्हें सही-गलत का मतलब सिखा दूंगा। तुमपर भरोसा है मेरी बच्ची, तुम जो करोगी सही होगा। अगर गलती से कोई कदम उठा भी लिया, तो ठोकर लगेगी और सीख जाओगी। तुम्हारा रक्षक नहीं बनूंगा, तुम्हें लड़ना सिखाऊंगा। हरदम साथ नहीं चलूंगा, अकेले चलना सिखाऊंगा। पिंजरे में बंद नहीं करूंगा, उड़ना सिखाऊंगा। जैसा कोई अपनी बेटी को नहीं बना सका, तुझे ऐसी बेटी बनाऊंगा।

तुम्हारा, बुद्धू पापा!
प्राणेश 
        

Wednesday, 30 November 2016

ठण्ड की वो शाम.. खाली बेंच और इंतज़ार

               उस शाम वो बसस्टॉप की ठंडी बेंच पर चुपचाप बैठा था। खाली, एकदम खाली। मन में ढेर सारे विचारों का गुबार सा उठ रहा था, लगातार कुछ सोच रहा था वो। उसे खुद इस बात का एहसास नहीं था कि बेंच पर बैठे एक घंटे से ज़्यादा वक़्त बीत चुका है और अंधेरा धीरे-धीरे घना होता जा रहा है। दरअसल वो खुद भी उलझा हुआ था, खुदसे ये पूछने में कि उसे क्या सोचना चाहिए और क्यों। विचार आते जा रहे थे और वो किसी मंझे हुए फुटबॉल खिलाड़ी की तरह उन्हें लात मारता जा रहा था। आखिर वह कर क्या रहा था, इस एक विचार को लात मारने ही वाला था कि रुक गया। हां! मैं क्या कर रहा हूं यहां? इतनी ठण्ड में। सामने एक बस खड़ी थी और उसकी खाली बेंच से दूर कुछ सवारियां बस के चलने के इंतज़ार में थीं। 'इंतज़ार', यहीं पर आकर आज थम गया वो। वो न तो कुछ करने आया था और न ही कुछ कर रहा था लेकिन अब उसके पास भी करने को कुछ था। ये कुछ था, इंतज़ार!
         उसने इंतज़ार करने का मन बनाया। किसी बस का नहीं, किसी इंसान का नहीं, किसी सपने, किसी चीज़ का नहीं। खुद का और इन विचारों के रुकने का इंतज़ार। अब उसे बेंच पर घंटों बैठने का मकसद समझ आ रहा था, वो भी तो इंतज़ार कर रहा था। वो बस सोचता जा रहा था, शायद खुद को तसल्ली देने के लिए सबसे आसान होता है इंतज़ार। हम किसी का करते हैं और कोई हमारा। इंतज़ार करने का ख्याल मन में आता ही किसी ज़रुरत के बाद है। हमें किसी की ज़रुरत हो और वो पास न हो तो इंतज़ार शुरू हो जाता है। हमें कुछ चाहिए और मिल नहीं पा रहा, क्या करेंगे इंतज़ार के अलावा। कई बार तो हमें भी नहीं पता होता हम किसका इंतज़ार कर रहे हैं, पर एक खालीपन होता है जिसे भरने की चाहत इंसान से लंबा इंतज़ार करवाती है। इंतज़ार करना विकल्प नहीं, ज़रुरत नहीं, मज़बूरी है। किसे अच्छा लगता है एक पल भी इंतज़ार करना, पर क्या करें करना पड़ता है।
       कभी सोचा है अगर इंतज़ार ही न हो तो! बेबस हो जाएगा इंसान। या तो बेचारा बन जाएगा या तो ताकतवर। तो कई बार इंतज़ार ज़िन्दगी भर का हो जाता है, कई बार ख़त्म हो जाता है। इंतज़ार जितना लंबा हो तक़लीफ़ उतनी बढ़ती जाती है। पर कोई क्या करे अगर इंतज़ार करते-करते अरसा बीत जाए और कोई न आए, क्या करना चाहिए उसे। खुद से यह कहना चाहिए कि बस अब और नहीं और ख़त्म करना चाहिए इंतज़ार, लेकिन सिर्फ तब जब खुदपर यकीन हो जाए। जब पता हो कि अब मुझे उसकी ज़रुरत ही नहीं जिसका मैं इंतज़ार करता रहा तो यही सही वक़्त है इंतज़ार ख़त्म करने का।
         उसके सामने से एक के बाद एक बसें गुज़र रही थीं, क्योंकि हर स्टॉप पर लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे। लोग बस का इंतज़ार कर रहे थे क्योंकि कोई उनका इंतज़ार कर रहा था। बेंच खाली है फिर भी कोई सवारी उसपर नहीं बैठती, इसकी वजह भी इंतज़ार है। इंतज़ार भी ऐसा जो चैन से बैठने नहीं देता, सुकून नहीं मिलने देता। बस खाली है फिर भी उन्हें जल्दी चढ़ना है जिससे उनका इंतज़ार जल्दी ख़त्म हो। इंतज़ार भी जब हद से ज़्यादा बढ़ जाए तो परेशान कर देता है।
         इंतज़ार करने वाले को ज़रुरत पूरी होने से ज़्यादा उसे पूरा करने वाले का इंतज़ार होता है क्योंकि अक्सर लोग यह समझने की भूल कर बैठते हैं कि उस एक चीज़ के अलावा ज़रुरत पूरी करने के लिए कोई विकल्प नहीं। वो उन परेशान चेहरों को देख रहा था जिन्हें उनकी बस का इंतज़ार था, बार-बार सड़क के दूसरे छोर को देख रहे थे। किसी भी बड़ी बस को आता देख उम्मीद बांध लेते थे और पास आकर वो निराश कर जाती थी। उन्हें सिर्फ अपनी उसी बस का इंतज़ार था जो उनका इंतज़ार कर रहे दूसरों का इंतज़ार ख़त्म कर सके। सामने खड़े ऑटो को सारे ऐसे नज़रंदाज़ कर रहे थे मानों वो वहां हों ही नहीं। इंतज़ार तो उन्हें बस का था न! भूल ही गए थे वो कि शायद आधे घंटे से अपनी बस का इंतज़ार करने से बेहतर होगा ऑटो से जल्दी जाकर बाकियों का इंतज़ार ख़त्म करना।
       उफ़! कितना उलझे हुए हैं सब आपस में, उसने खुदसे पूछा। अच्छा लगने लगा उसे यह सोचकर कि उसे किसी बस का इंतज़ार नहीं करना क्योंकि किसी को उसका इंतज़ार नहीं और उसे कहीं जाने की जल्दी नहीं। उसकी यह खुशी अचानक फीकी पड़ गई, चेहरे का रंग उतर गया और आंखें भर आईं। कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा, क्या सच में! पिछले तीन घंटे में किसी ने नहीं पूछा कहां हो, आ जाओ न। मोबाइल की स्क्रीन भी सिर्फ वक़्त बता रही थी, कोई मैसेज नहीं था वहां। इसका सीधा मतलब तो यह हुआ कि किसी को उसको ज़रुरत ही नहीं। उसे गुस्सा भी आया और रोना भी, मन बना लिया कि अब इस बेंच से तब तक नहीं जाएगा जब तक कोई उसे बुलाता नहीं।
         वक़्त बीत रहा था और उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। क्या सच में किसी को उसकी ज़रुरत नहीं, यह सच वो मानने को तैयार ही नहीं था। इससे पहले कि पलकों पर ठहरे आंसू बाहर आने की जगह बना पाते, अचानक वह हंस पड़ा। इस हंसी की वजह थी उसकी अपनी नादानी। इंतज़ार के बारे में सोचते-सोचते वो खुद इसके चंगुल में फंसकर गंवा बैठा था अपना चैन। वो भी तो इंतज़ार करने लगा था किसी के फ़ोन का, किसी मैसेज का, किसी के ये कहने का कि जल्दी आ जाओ, तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं। बेवकूफी और बेफिक्री से उसने अपने आसपास देखा। बेंच, लोग, बसें और उनका इंतज़ार। समझने लगा था वो।
    किसे पता था वो यहां आएगा, बैठेगा और इंतज़ार के बारे में सोचेगा। शायद यह जगह उसका इंतज़ार करती रही हो, इस बेंच को उसका इंतज़ार रहा हो। अगर न भी रहा हो तो क्या उसे इसलिए यहां नहीं होना चाहिए था कि यहां कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा था। वह अपनी नादानी पर हंस रहा था।
       उसे अब किसी का इंतज़ार नहीं बनना था, क्योंकि खुद भी किसी का इंतज़ार नहीं करना था। इतना मतलबी नहीं था वो कि सिर्फ लोगों का इंतज़ार ख़त्म कर उनकी ज़रूरतें पूरी करे। उसे हर उस जगह रहना था जहां वह उन लोगों को हंसी बांट सके जो परेशान हैं और जिन्हें किसी और इंतज़ार की वजह से चैन-सुकून नहीं मिल रहा। वो हर किसी के साथ था, मदद कर सकता था। उसे कोई जल्दी भी नहीं थी क्योंकि कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा था। अब उसका खुदका इंतज़ार भी ख़त्म हो चुका था, वो तो उसके मन में था ही नहीं। अब वो इस जगह से जाने को तैयार था, सचमुच तैयार। बढ़ते अंधेरे ने उसके मन में उजाला कर ही दिया था। चलने को तैयार, मुस्कराकर वो बेंच से उठा और पीछे मुड़कर बोला, 'सुनो! मेरा इंतज़ार मत करना।'

Thursday, 22 September 2016

'उधार'

शायद उधार अभी बाकी है,
नहीं पैसे नहीं! ना कोई सामान!
बाकी है तुम्हारे पास फिर भी बहुत कुछ मेरा।
याद रहेगी साथ बीती शाम, साथ हुआ सवेरा।

यूं तो मैं देता नहीं हर किसी को वक़्त अपना,
दिया तुम्हें, देखा तुम्हारे साथ, तुम्हारा सपना।
कर सकोगे वापस वो वक़्त मुझे!
कहां से लाओगे वो पल जो चले गए?

हां, सिर्फ मैं ही नहीं तुम भी तो कर्ज़दार हो।
ऐसा लगता है मुझपर कम तुमपर ज़्यादा उधार हो।
बांटे थे जो आंसू तुम्हारे, वापस नहीं मांगूगा।
पर खुद से वादा है, अब किसी का दर्द नहीं बांटूगा।

क्या वो तुम ही थे जो कंधे पर सिर झुकाकर रोए थे,
हां तुम ही तो थे जो मुझे दोस्त मान बेफिक्र सोए थे।
याद है न! कि ये भी भूल गए हम साथ थे।
अंधेरे रास्ते पर हाथों में हाथ थे, जज़्बात थे।

बहुत भोले हो मेरे दोस्त अच्छे से जानता हूं।
पर यह भी सच है कम लोगों को अपना मानता हूं।
तुम उन्हीं कम लोगों में से एक थे, क्योंकि नेक थे।
समझ जाना था पहले ही तुम्हें, पर समझे देर से।

हां! बुरा हूं मैं! जल्दी रूठ जाता हूं।
आवाज़ नहीं आती फिर भी टूट जाता हूं।
रोता हूं अकेले में पर सामने गुस्सा दिखाता हूं।
एक बार गया तो लौटकर वापस नहीं आता हूं।

-: प्राणेश तिवारी

Sunday, 17 July 2016

ताकि सिर्फ नाम बनकर न रह जाए 'शीरोज हैंगआउट'

         एसिड अटैक पीडि़त महिलाओं के हौसले को हिम्मत देने के मकसद से राजधानी में की गई पहल फीकी पड़ती नजर आ रही है। ताजनगरी आगरा में सफल रहे प्रयास की तर्ज पर लखनऊ में भी 'शीरोज हैंगआउट' कैफे खोला गया था। महिला दिवस के मौके पर आठ मार्च को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गोमतीनगर स्थित इस कैफे का उद्घाटन किया था। कैफे की खासियत है कि यहां काम करने वाला स्टाफ एसिड अटैक पीडि़त महिलाओं का है। चार महीने से ज्यादा बीत जाने के बाद आलम यह है कि यहां आना तो दूर, आधा शहर इस जगह का नाम तक नहीं जानता। 'शीरोज हैंगआउट' अंबेडकर पार्क  के ठीक सामने है लेकिन हर शाम पार्क  में जुटने वाली सैंकड़ों की भीड़ को इस जगह के बारे में नहीं पता।


इतना ही नहीं, आसपास रहने वाले लोग भी शीरोज हैंगआउट के नाम से अनजान दिखे। वजह भी सीधी सी है न तो इस जगह के बारे में कोई प्रचार किया गया और न ही इसकी खासियत लोगों तक पहुंची। पिछले दिनों आयोजित मैंगो फेस्टिवल तो होर्डिंग्स के जरिए शहर के कोने-कोने में पहुंच गया, लेकिन शीरोज हैंगआउट की खासियत बताती कोई होर्डिंग शहर में नहीं दिखती। सोमवार को जब मैं शीरोज हैंगआउट के हालात का जायजा लेने पहुंचा तो इक्का-दुक्का लोगों के अलावा बाकी कुर्सियां खाली दिखाई दीं। यह कैफे तेजाब हमले का दर्द झेल चुकी महिलाओं के चेहरे पर आत्मविश्वास और खुशी लाने के मकसद से खोला गया था। लोगों से मिल रही प्रतिक्रिया इसके लिए नाकाफी दिखती है।

           शीरोज हैंगआउट के मैनेजर पवन सिंह ने बताया कि यहां प्रदेश भर के सहारनपुर, कासगंज, फैजाबाद जैसे जिलों से आठ विक्टिम काम कर रही हैं। पहले कैफे सिर्फ शाम पांच से रात 10 बजे तक खुलता था, अब पूरे दिन खुला रहता है। हालांकि लोगों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है। उन्होंने बजट की कमी को बड़ी वजह मानते हुए कहा कि गर्मी में यहां एसी होनी चाहिए। खुला स्पेस होने की वजह से गर्मी और धूप से बचत नहीं हो पाती, ठंड से पहले यह इंतजाम भी पक्के होने चाहिए। ग्लासेज भी लगने है जिसके लिए अगले एक दो महीने में काम शुरू हो जाएगा। इसके अलावा प्रचार के लिए पैम्प्लेट भी छपवाए जा रहे हैं। प्रोजेक्ट डायरेक्टर भूपेंद्र ने भी माना कि लोग कम आ रहे हैं और कैफे को एडवरटाइजमेंट की जरूरत है। कैफे में काम करने वाली प्रीती, अंशू, शांति, प्रमोदिनी, रुपा और रेशमा को आने वाले दिनों में कैफे में भीड़ बढऩे की उम्मीद है।


                                                                       रेस्टोरेंट से कहीं ज्यादा है शीरोज हैंगआउट 

शीरोज का नाम अंग्रेजी के दो शब्दों 'शी' और 'हीरोज' को मिलाकर रखा गया है। यह जगह समाज के ऐसे हीरोज से रूबरू होने का मौका देती है जिन्होंने अपनी पहचान खोकर भी जिंदगी से हार नहीं मानी। यह हीरोज खुद को पीडि़त नहीं मानते, दूसरों को हिम्मत देने का माद्दा रखते हैं। शीरोज हैंगआउट केवल रेस्टोरेंट या कैफे न होकर यहां आने वाले कई लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बना है। इस कैफे में आर्ट गैलरी, बुक रीडिंग सेक्शन के अलावा वर्क शॉप और प्रदर्शनी के लिए स्पेस भी है जहां इन वर्कर्स के  हाथों का हुनर और कौशल दिखता है। यहां आने वाले लोग इन प्रदर्शनियों में लगी कलाकृ तियां देखते हुए और किताबें पढ़कर भी अपना समय बिता सकते हैं। पहले यह कोशिश आगरा में की गई जहां देश-विदेश से आने वाले हजारों पर्यटकों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली। राजधानी में जो चंद लोग शीरोज आते हैं उनके लिए यह रेस्टोरेंट का एक विकल्प है। मैनेजर पवन कहते हैं कि यहां सिर्फ टाइमपास ही नहीं बहुत कुछ इनोवेटिव किया जा सकता है। जो लोग हमसे जुडऩा चाहते हैं और बातें साझा करते हैं, यहां से बहुत कुछ लेकर और प्रेरित होकर जाते हैं।

                   दिल से पसंद है लखनऊ, पर जाने क्यों लोग कम आते हैं : फरहा खान 

        मूल रूप से फर्रुखाबाद से जुड़ी फरहा खान 'शीरोज हैंगआउट' की शुरूआत से यहां काम कर रही हैं। उनका परिवार दिल्ली में रहता है और सभी भाई बहनों में वह सबसे बड़ी हैं। कहती हैं कि मुझे बहुत कम शहर पसंद आते हैं लेकिन लखनऊ दिल से पसंद है। मैं भूलभुलैया घूमने गई हूं और मुझे यहां की इमारतें बहुत पसंद हैं। लखनऊ की तहजीब सबसे खास है लेकिन जमाने का असर इस पर भी हुआ है। शीरोज से अपना लगाव जताते हुए उन्होंने बताया कि हमारे लिए यहां रहना परिवार में रहने जैसा है। अभी यह परिवार छोटा है, वक्त के साथ बड़ा हो जाएगा। फरहा ने बताया कि वैसे तो आगरा के शीरोज के मुकाबले यहां लोग न के बराबर आते हैं। फिर भी कई ऐसे लोग हैं जो सप्ताह में एक बार या महीने में एक बार हमारे लिए वक्त निकालकर हमसे मिलने आते हैं, अच्छा लगता है। सुरेंद्र राजपूत यहां रोज आने वालों में से हैं। फरहा लोगों के कम आने के पीछे अच्छी ब्रांडिंग न होने को वजह मानती हैं। उन्हें लगता है कि शीरोज हैंगआउट से लोगों को जोडऩे के लिए अगर ब्रांडिंग पर काम किया जाए तो लोग यहां आयेंगे भी और इसके बारे में जानने को उत्सुक भी होंगे। 

                  चाहती हूं लोग हमसे जुड़ें, इसे सिर्फ कैफे समझकर न आएं : अंशू


अंशू ने इस साल इंटर किया है और अब आगे पढऩा चाहती हैं। कहती हैं मैं खूब पढऩा चाहती हूं और अपनी पहचान बनाना चाहती हूं। यूं तो घर में छोटी हूं फिर भी जिम्मेदारी समझते हुए दूसरों की मदद करना चाहती हूं। बिजनौर जिले की अंशू पहले आगरा और अब लखनऊ में शीरोज से जुड़ी। उन्हें इस बात की खुशी है कि 'शीरोज हैंगआउट' ने उन्हें पहचान दी है। बड़े गर्व से कहती हैं कि अब हमें चेहरा छुपाने की जरूरत नहीं, और वैसे भी हमने कुछ गलत नहीं किया तो क्यों छुपते फि रें। लोगों से हैंगआउट को मिल रही प्रतिक्रिया के सवाल पर वह साफ कहती हैं कि अगर कोई आता है तो कपल्स। उन्हें इस बात से भी शिकायत है कि लोग यहां अपना फूड इंज्वाय करते और चले जाते हैं, किसी को इस बात से फर्क  नहीं पड़ता कि वह शीरोज में हैं। अंशू ने बताया कि आगरा में बच्चा-बच्चा शीरोज हैंगआउट के नाम से वाकिफ है, जबकि यहां आने वालों को इसके अलग होने से कोई मतलब नहीं। शायद यही वजह है अंशू आगरा को ज्यादा पसंद करती हैं। अपनी दोस्त रितु की उन्हें बहुत याद आती है। बेहद जिंदादिल अंशू मुस्कराते हुए कहती हैं,'लखनऊ से बहुत उम्मीदें हैं। पता नहीं यह शहर हमें समझने में इतना वक्त क्यों लगा रहा है।'

Monday, 18 April 2016

और जब मैंने बर्तन धोए!

आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था, लेकिन आज हालात कुछ बदले हुए से लग रहे थे. परिवार एक शादी में शामिल होने गाँव गया था और मैं घर पर अकेले किसी राजा की तरह चहलकदमी कर रहा था. अपने मन को हर पसंदीदा काम करने के लिए तब तक मनाता रहा, जब तक थक कर चूर नहीं हो गया. नज़रें घड़ी की ओर उठीं तो दोनों सूइयां मुस्कराते हुए 10 बजकर 10 मिनट का इशारा कर रही थीं.
   
     भई हमने अपने अभिन्न अंग मोबाइल महाशय से सॉरी बोलते हुए सोने का मन बनाया ही था कि याद आया, दोपहर से लेकर रात के खाने तक के सारे बर्तन मेरे इंतज़ार में बैठे हैं. तो मैं बर्तन धुलूँगा? एक पल तो मुझे ये समझने में लग गया कि यहाँ पर दूसरा कोई नहीं है जिसे यह काम सौंपा जा सके. 'हिम्मत-ए-मर्दा, मदद-ए-खुदा', यही सोचकर हमने बाहें समेटीं और ठीक 10 बजकर 18 मिनट पर घर में बर्तनों की आवाज़ सुनाई देने लगी. एक के बाद एक, बर्तन मानों बढ़ते जा रहे थे. छोटे-छोटे चम्मच मानों लुका-छिपी खेल रहे थे और कुकर-कड़ाही किसी बड़े दैत्य की तरह मुझे चुनौती दे रहे थे.


     एक के बाद एक बर्तन को बेमन से घिसता मैं ऊब चुका था. अब समझ आ रहा था कि मम्मी क्यों बेवजह बर्तन जूठे करने से मना करती हैं, पर मैं अपनी आदत से बाज़ नहीं आता. हालाँकि अब मेरी मेहनत रंग लाने लगी थी और बर्तन मुझे मेरी ही सूरत दिखाकर हंसने लगे थे, वहीँ काली कड़ाही एकमात्र कठिन चुनौती बनकर सामने थी. बाकी बर्तनों को धुलकर किनारे करने के बाद हमने कुकर जी की सेवा शुरू की. ख़ुशी हुई कि उन्होंने जल्दी ही हथियार डाल दिए.

     अब मैं बुरी तरह थककर चूर हो चुका था और मुझे गुस्सा भी आ रहा था, सारा गुस्सा काली कड़ाही पर उतारते हुए मैं टूट पड़ा. मैं घिसता जा रहा था लेकिन कड़ाही ने मेरा साथ न देने की ठान ली थी. आखिर मैंने मान लिया कि इसका कुछ नहीं हो सकता. बाकी बर्तनों को किचन में सजाने के बाद मैंने कड़ाही को यूं ही छोड़ दिया.
 
    बिस्तर पर आकर लेटा था तभी कल सुबह बने पालक के पकौड़े याद आए, पूरी-कचौरी, चटपटी सब्जी से लेकर ढेर सारे पकवान याद आने लगे. इन सारे पकवानों में एक चीज़ सामान थी और वो इनकी तेल में छनछन! अब मुझे किचन में पड़ी काली कड़ाही से सहानुभूति हो रही थी जो खुद जलकर मुझे पकवानों का आनंद देती रही है. एक बार फिर मैं कड़ाही पर हाथ घिस रहा था, लेकिन इस बार प्यार से. शायद ये मेरा प्यार ही था कि कड़ाही में मुझे मेरा मुस्कराता चेहरा नज़र आने लगा था और काली कड़ाही अब बर्तनों की रानी की तरह किचन में सजा दी गई थी.
 
    ठीक 12 बजे जब मैं फिर से बिस्तर पर गया तो थकान से ज्यादा संतोष था और माथे पर शिकन नहीं होंठों पर मुस्कान थी. आज मैंने सिर्फ बर्तन ही नहीं अपने मन को भी धोया था, उस रात सच में मैं बहुत सुकून से सोया था. 

Tuesday, 8 March 2016

अबला नारी नहीं सब पर भारी है आज की महिला!

        मैं आज की नारी हूँ। जिस नारी का स्वरूप इस पुरुषप्रधान समाज ने हमेशा से ही कमजोर व बेबस बनाते हुए हमें अबला नाम दिया था, आज वही समाज हमारी सफलता को चुनौती मानकर घबराया हुआ है। हम पर हमेशा बन्दिशें लगती रहीं, सीमाओं और मर्यादा के दायरे में हमें हमेशा से ही बांधा गया। इसके बावजूद हम बढ़ते रहे, एहसास दिलाते रहे कि आप अकेले नहीं हैं। हमने आपको कभी नीचा नहीं दिखाया, चुनौती नहीं दी। हमें तो सिर्फ अपना हक़ चाहिए, आप हमें रोकने की लाख कोशिशें कर लें, अपने अधिकार हम लेकर रहेंगे।

हमारी कहानी हमेशा दुख भरे शब्दों में बयां की जाती है। हमारी छवि समाज में पीड़ित, दुखी और बेचारी महिला वाली बनाकर प्रस्तुत की जाती है। सच तो ये है, अब मैं अबला नहीं रही। मुझे पता है कि मुझे अपने अधिकारों की लड़ाई किस तरह लड़नी है और कैसे कंधे से कंधा मिलाकर चलना है। हमें आगे बढ़ता देख पहले रीति रिवाजों और रूढ़ियों की ज़ंजीरों से बांधने की कोशिश की गई और जब ये ज़ंजीरें भी हमें बांध न सकीं तो सामाजिक मर्यादाओं और सीमाओं का हवाला दिया गया। हम पर एक के बाद एक दबाव डाले गए। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस दबाव ने हमें कमजोर बनाने के बजाय और मजबूत कर दिया। बढ़ते सामाजिक दबाव के साथ हमारी शख्सियत दिनों दिन निखरती गई।

आज मैं ऑफिस और घर दोनों की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाने में सक्षम हूँ, एक अच्छी माँ हूँ, जिम्मेदार पत्नी हूँ और कुशल गृहिणी भी हूँ। मुझे नहीं अच्छा लगता जब महिलाओं को बेचारी या कमजोर कहते हुए लेख लिखे जाते हैं। अपने हक़ की लड़ाई लड़ने को तैयार अब मैं मजबूर या कमजोर नहीं। मैं किसी की गुलाम नहीं।

देश में महिला साक्षरता दर बढ़ रही है क्योंकि अब तक सिर्फ सपने देखने वाली महिलाएं हर सपना पूरा करने का मन बना चुकी है। हमारे सपने अब एक अच्छे जीवनसाथी और अच्छे ससुराल तक ही सीमित नहीं रहे, अब मैं एयरहोस्टेस बन आसमान में उड़ने के सपने देखती हूँ तो कल्पना चावला की तरह अन्तरिक्ष में तैरने के! इतना ही नहीं देश के विकास में हमारा प्रतिशत पुरुषों से कुछ कम नहीं है। आम धारणा से उलट भारत में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत अपेक्षाकृत ज़्यादा है। महिलाओं की भागीदारी कृषि में जहां 55% से 66% है वहीं डेयरी उद्योग में तो 94% हिस्सा महिलाओं का है। यही वजह है कि हमारे अधिकार भी बढ़े हैं।

मैं इस बात से इनकार नहीं करती कि आज भी हम कई समस्याओं और हमारे खिलाफ बढ़ते अपराधों से घिरे हैं, लेकिन इसका मतलब यह कहीं से नहीं कि हमें कमजोर समझने के भूल की जाए। यह सब ज़्यादा दिन तक नहीं चलने वाला, बहती हुई नदी और सुबह की धूप की तरह आगे बढ़ रही हूँ मैं। हमारा आगे बढ़ना जो समाज के लिए खुशी की बात है उसे लेकर पुरुष वर्ग घबराया और बौखलाया सा दिख रहा है। यूं तो आज की नारी को किसी की स्वीकृति की ज़रूरत नहीं, लेकिन बेहतर होगा अगर समाज हमारी पूर्णता को स्वीकार करे, अबला नारी वाले दबे कुचले नहीं बल्कि अष्टभुजी माँ दुर्गा वाले स्वरूप को स्वीकार करे। 

Thursday, 3 March 2016

पैरों में पहना जाता हूं!

कभी पैरों में पड़ा तो कभी घर के कोने में; मैं जूता हूं। जाने क्यों लोग मुझे इतना गिरा हुआ समझते हैं? कहते हैं तुम्हे तो मैं पैरों की जूती भी न बना । आखिर क्या ग़लती है मेरी? धूल ; पत्थर और कांटो से भरे रास्तों में तुम्हारे पैरों को बचाता हूं; खुद उफ भी नहीं करता जाने क्या क्या सह जाता हूं।
मुझे पाॅलिश करने का वक्त भी नहीं होता तुम्हारे पास। क्या तुम्हें पता है, बाहर बैठे बूट पाॅलिश वाले राजू को एक वक्त की रोटी मैं ही दिलाता हूं। इतना छोटा भी मत समझो मुझे, बड़े बड़े लोगों को फेंककर मारा जाता हूं। जब भी किसी के सिर पर पड़ता हूं, तो सिर्फ दर्द ही नहीं देता, उसका सम्मान भी ले जाता हूं।

कुछ भी हो जूता हूं, पैरों में पहना जाता हूं। दर दर की ठोकरें खाता हूं, घिसता हूं, फट जाता हूं और कबाड़ में फेंक दिया जाता हूं। जाने क्यों मैं गिरा हुआ समझा जाता हूं?
               लेकिन मेरी अहमियत तो उस दिन समझ आती है, जब मैं मन्दिर से चोरी हो जाता हूं। जब तुम नंगे पांव घर आते हो, तो मैं बहुत याद आता हूं। पर क्या करुं? जूता हूं पैरों में पहना जाता हूं।

Sunday, 21 February 2016

खुद से रूठा सा हूँ मैं! (स्वरचित)


न उसकी कोई गलती थी न हमने खता की,
वक़्त बदला यूँ कि सारी खुशियां मिटा दीं।
जानते थे एक दिन ज़रूर आएगा ये मंज़र,
पर इस तरह न आए इसकी हरदम दुआ की।
अश्क थे उन आँखों में जिनमे परछाईं मेरी होती थी,
जिनके सामने होने पर तनहाई मेरी खोती थी।
हम दूर थे इतना उनसे नज़रें भी न मिला सके,
बिछड़ने से पहले उन्हें गले भी न लगा सके।


टूटना था रिश्ता तो झटके से तोड़ दिया,
दर्द का एहसास हो इससे पहले मुंह मोड़ लिया।
सच्ची चाहत थी और सच्चे थे वादे भी,
 न चाहते हुए भी उसने मेरा साथ छोड़ दिया।



अकेला खड़ा मानों ठिठका सा हूँ मैं,
समझ ही न आए कि अब क्या करूँ मैं।
कर सकूं कल से एक नई शुरुआत शायद,
मगर एक बार फिर से तनहा सा हूं मैं।
खुद से छूटा सा हूँ मैं, फिर से टूटा सा हूं मैं, 
एक बच्चे की तरह खुद से रूठा सा हूँ मैं।

-: प्राणेश तिवारी