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Saturday, 24 February 2018

नथिंग इमोशनल

कहने को बहुत कुछ है,
जताने बताने को है उससे भी ज़्यादा...
हैं केवल इमोशन्स दोनों ओर,
लेकिन #nothing_emotional का है वादा..

मिलना एक अजनबी से करना दोस्ती बस यूं ही,
समझाते हुए बस इतना कि मैं इमोशनल नहीं हूं।
समझना उलझनों को, सुलझाना अनबूझी पहेलियां,
फिर एक रोज जताना, मैं आज हूं-बीता कल नहीं हूं..

दूसरों के झगड़े निपटाते-सुलझाते, खुद घंटों बैठना साथ,
बिना बात की बात और बस यूं ही हाथों में हाथ।
सुनो! ये खत्म नहीं होना चाहिए, पूछा क्या तो बोली,
यही जो प्यारा सा रिश्ता है, ये जो बॉन्ड चल रहा है साथ।

बातों से चंद कदम साथ चलने और आने तक पास,
क्या समझ सके कब कौन हुआ किसके लिए खास।
लेकिन एक भूखा रहा, तो मर गई दूसरे की भूख-प्यास।
दो नहीं-चार आंखें छलकीं, जब कोई भी हुआ उदास।

इस तरह पास आना और एक दोस्त-एक साथी पाना,
आसान नहीं था, पर लगा जैसे जंगल में हाथी पाना।
कभी कंधे पर तो कभी गोद में सिर रखकर सो जाना,
सबको शक होने लगा, इस तरह हमने एकदूजे को माना।

हमारी दुनिया अलग थी, जहां थी चाय और कोल्ड कॉफी।
बेवजह फिरने की आदत, थी शाम वाली डांट और माफी।
यादें बटोरते और बांटते एहसास, रूठना मनाना रहा जारी।
सुबह-शाम साथ होकर भी लगा, कुछ बातें रह गईं बाकी।

बाकी रह गईं बातें और वक़्त आ गया लेने का विदा।
तेज नदी के एक किनारे तू, तो दूसरे किनारे जैसे मैं था।
ज़िद अब भी थी मिलने की, किनारों को मिलाता रहा।
तैरना न सीखा, डूबने की चाह में तेरे पास आता रहा।

हमारी यारी फिर जीती, और तुझे अपने साथ ले आया।
खत्म कर दिए दो किनारे, देख तुझे पक्के घाट ले आया।
मुमकिन तो नहीं होता दो दोस्तों का यूं साथ रहना,
लेकिन हम मिले क्योंकि तुझे यहां मेरा विश्वास ले आया।

रेत की टीलों से लेकर गीले पैरों और हवाई जहाज तक,
जीते रहे हैं एक अलग ज़िन्दगी साथ हम तो आज तक।
गर्म रसगुल्लों की मिठास से लेकर रेत की ठंडक तक,
और गंगा में तैरते दियों से लेकर बनारस के घाट तक।

यहां यादें बिखरी हैं, एहसास के मोतियों से टूटे हैं पल।
हमारा वजूद ही क्या है, यही बातें रहेंगी आज-कल।
हां पता है, चाहते हैं, हर दूरी-हर मुश्किल बस जाए टल...
फिर दोहराता हूं मेरी दोस्त.. #nothing_emotional

Monday, 3 October 2016

बदल रहा हूं...

क्या कभी खोए हो तुम,
भीड़ में अपनों के बीच!
कभी रोये हो तुम,
या कभी टूटकर सोए हो तुम।

शायद नहीं, पर मैं रोता हूं...
इसलिए नहीं कि खोना नहीं चाहता।
इसलिए नहीं, कि बिखरे मोती पिरोना नहीं चाहता।
इसलिए, क्योंकि हर बार ये माला टूट जाती है।
बिखर जाते हैं मोती फिर से, आस छूट जाती है।

चुनौतियां पसंद हैं मुझे, मिलती ही जाती हैं।
एक पल मुस्कराकर, ज़िन्दगी फिर रूठ जाती है।
खुद को साबित करते करते, बहुत थक जाता हूं।
भर आती हैं आंखें जब, मुस्कराकर छुपाता हूं।

जी रहा हूं ज़िन्दगी, या फिर ये मुझे जी रही है।
यादों के परदे का वो छेद, उम्मीदें सी रही हैं।
सच्ची और झूठी बातें अब तक एक सी रही हैं।
आंखों का नहीं पता, आंसू क्यों पी रही हैं!

सच और झूठ के इस फेर से अब निकल रहा हूं,
भारी हैं कदम, बढ़ते नहीं, फिर भी चल रहा हूं।
कभी-कभी ऐसा लगता है खुद को ही छल रहा हूं,
या फिर क्या सच में, 'मैं बदल रहा हूं।'
-: प्राणेश तिवारी 

Friday, 23 September 2016

'मैं लड़की हूं'

माना मैं एक लड़की हूं,
पर हूं तो एक इंसान।
क्या फ़र्ज़ नहीं बनता है तुम्हारा,
कि करो मेरा सम्मान...

भोली हूं मैं, नादान हूं।
पर क्या यही मेरी गलती है!
मुझे बेजान समझना, और खेल जाना मुझसे।
इससे तुम्हें क्या ख़ुशी मिलती है?

दोस्त माना था तुम्हें, साथी माना था।
मुस्कान तुम्हारी सच्ची लगी, ऐसे पहचाना था।
पर क्या पता था, तुमने एक मुखौटा लगाया है।
अपने बेशर्म चेहरे को भोलेपन से छुपाया है।

मैंने नहीं दिया हक़ किसी को, जो चाहे जताने का।
मेरे बारे में कुछ भी बोलने का, मज़ाक बनाने का।
पर फिर भी ऐसा करते हो, तो शर्म करो इंसान हो।
शक होता है अब मुझको भी, तुम मानस की संतान हो।

तय करते हो मेरा चरित्र और नाम मुझे तुम देते हो।
एक पल में मन में अपने तुम, जो चीर मेरा हर लेते हो।
कायर हो, तुम हो बेईमान, काश ये खुद को समझाओ।
बेहतर होगा चुल्लू भर पानी में डूबो और मर जाओ।
                           
                                             : प्राणेश तिवारी

Thursday, 22 September 2016

'उधार'

शायद उधार अभी बाकी है,
नहीं पैसे नहीं! ना कोई सामान!
बाकी है तुम्हारे पास फिर भी बहुत कुछ मेरा।
याद रहेगी साथ बीती शाम, साथ हुआ सवेरा।

यूं तो मैं देता नहीं हर किसी को वक़्त अपना,
दिया तुम्हें, देखा तुम्हारे साथ, तुम्हारा सपना।
कर सकोगे वापस वो वक़्त मुझे!
कहां से लाओगे वो पल जो चले गए?

हां, सिर्फ मैं ही नहीं तुम भी तो कर्ज़दार हो।
ऐसा लगता है मुझपर कम तुमपर ज़्यादा उधार हो।
बांटे थे जो आंसू तुम्हारे, वापस नहीं मांगूगा।
पर खुद से वादा है, अब किसी का दर्द नहीं बांटूगा।

क्या वो तुम ही थे जो कंधे पर सिर झुकाकर रोए थे,
हां तुम ही तो थे जो मुझे दोस्त मान बेफिक्र सोए थे।
याद है न! कि ये भी भूल गए हम साथ थे।
अंधेरे रास्ते पर हाथों में हाथ थे, जज़्बात थे।

बहुत भोले हो मेरे दोस्त अच्छे से जानता हूं।
पर यह भी सच है कम लोगों को अपना मानता हूं।
तुम उन्हीं कम लोगों में से एक थे, क्योंकि नेक थे।
समझ जाना था पहले ही तुम्हें, पर समझे देर से।

हां! बुरा हूं मैं! जल्दी रूठ जाता हूं।
आवाज़ नहीं आती फिर भी टूट जाता हूं।
रोता हूं अकेले में पर सामने गुस्सा दिखाता हूं।
एक बार गया तो लौटकर वापस नहीं आता हूं।

-: प्राणेश तिवारी

Sunday, 8 May 2016

'माँ तू कहाँ है!'

सोचा आज माँ पर कविता लिखूं,
लिखने बैठा तो समझ न आया क्या लिखूं!

लिखूं उसके प्यार का गीत,
या त्याग की कहानी लिखूं।
हर खुशी है जिसकी मुझसे,
क्या उसकी ज़ुबानी लिखूं।

लिखूं ममता का आँचल,
गोद में मिलने वाला चैन लिखूं।
बीमार और बेचैन था जब,
तब क्यों भीगे उसके नैन लिखूं।

लिखूं वक़्त जो मेरे नाम किया,
जो दिया मुझे वो प्यार लिखूं।
लिखूं उसने चाहा मुझे कितना,
या फिर इसका आभार लिखूं।

क्यों लिखूं उस रिश्ते की कहानी चंद शब्दों में,
जिसे बयां करने को सारी ज़िन्दगी अधूरी है।
जिससे हूँ जिसका हूँ और जिसके लिए हूँ मैं,
कोई और नहीं एक 'माँ' वो मेरी है।

और हां!
हमारे इस जहाँ में, एक उनका भी जहाँ है,
जिन मासूमों को नहीं उनकी माँ का पता है।
हम आज शान से कहते हैं, मेरे पास माँ है!
वो बच्चे आज भी पूछ रहे,'माँ! तू कहाँ है?'

-: प्राणेश तिवारी (स्वरचित)

Sunday, 21 February 2016

खुद से रूठा सा हूँ मैं! (स्वरचित)


न उसकी कोई गलती थी न हमने खता की,
वक़्त बदला यूँ कि सारी खुशियां मिटा दीं।
जानते थे एक दिन ज़रूर आएगा ये मंज़र,
पर इस तरह न आए इसकी हरदम दुआ की।
अश्क थे उन आँखों में जिनमे परछाईं मेरी होती थी,
जिनके सामने होने पर तनहाई मेरी खोती थी।
हम दूर थे इतना उनसे नज़रें भी न मिला सके,
बिछड़ने से पहले उन्हें गले भी न लगा सके।


टूटना था रिश्ता तो झटके से तोड़ दिया,
दर्द का एहसास हो इससे पहले मुंह मोड़ लिया।
सच्ची चाहत थी और सच्चे थे वादे भी,
 न चाहते हुए भी उसने मेरा साथ छोड़ दिया।



अकेला खड़ा मानों ठिठका सा हूँ मैं,
समझ ही न आए कि अब क्या करूँ मैं।
कर सकूं कल से एक नई शुरुआत शायद,
मगर एक बार फिर से तनहा सा हूं मैं।
खुद से छूटा सा हूँ मैं, फिर से टूटा सा हूं मैं, 
एक बच्चे की तरह खुद से रूठा सा हूँ मैं।

-: प्राणेश तिवारी

Friday, 9 October 2015

"उलझन"

वक़्त की रेत पर नाम लिखने चला हूँ,
जो बन न सका अब वो दिखने चला हूँ।
उजाले को दीपक भी मैंने जलाये,
अँधेरी गली में भटकने चला हूँ।
मिला जो भी मैंने गले से लगाया,
सहारा दिया और समय से मिलाया।
जाने कहाँ रह गयी थी कमी पर,
हर किसी ने मुझे ही बुरा क्यों बनाया।

यूं तो लड़ता हूँ खुद से नयी जंग मैं भी,
भरता हूँ जीवन में कुछ रंग मैं भी,
चाहत बना हूँ कई दिलों की मैं,
पर कुछ हैं जिन्हें चाहता आज मैं भी।
सुनहरा हो कल ये इबादत नहीं है,
मिलें सारी खुशियाँ ये चाहत नहीं है।
सुनाता हूँ अपनी कहानी जो सबको,
कहते कल जो सुना था ये किस्सा वही है।

कल को उलझा हुआ अब सुलझने लगा हूँ,
वक़्त की आग में यूं सुलगने लगा हूँ।
टूटा हुआ अब मैं जुड़ने चला हूँ,
शायद मैं खुद को समझने लगा हूँ।
-: प्राणेश तिवारी