Tuesday, 12 July 2016

'तोता-मैना स्थल' बन चुके शहर के पार्कों में बहती प्रेम-रस की धारा...

          सुबह-सुबह ठंडी हवा और हरियाली में टहलना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है. शहरों में कंक्रीट की इमारतों की भेंट चढ़ती हरियाली को बचाने और लोगों को स्वस्थ रखने के लिए पार्क बनाए गए. सुबह शाम यहां टहलने आने वालों की संख्या सैकड़ों में है. हर दूसरा मधुमेह का मरीज डाक्टर की सलाह मानकर कार से ही सही लेकिन पार्क तक ज़रूर आता है. लेकिन जितना मधु इन पार्कों में है, उसके दर्शन मात्र से ही आप बीमार हो सकते हैं.

         मुद्दा जरा अटपटा लग सकता है, लेकिन न आप और न ही मैं इससे अंजान हैं. मेरा एक साथी मजाकिया लहजे में अक्सर कहता है दुनिया में प्यार कहीं है, तो पार्कों में! वैसे तो  घूमने का आनंद गाँवों में कहीं भी मिल जाता है, लेकिन उस रोज ऑफिस के असाइनमेंट के चलते एक पार्क के भ्रमण का सुअवसर मिला. हम गन्दगी और अव्यवस्था से जड़ी खबर ढूंढने निकले थे, प्रवेश करते ही साथी का जुमला याद आ गया.


        पार्क में ओर प्रेम की धारा बह रही थी. कहीं पेड़ की छांव तो कहीं हरी घास पर प्रेम-पुजारी अपनी साधना में लीन थे. दीन-दुनिया से बेफिक्र उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आसपास कौन आ-जा रहा है. लग रहा था जैसे बिना कैमरे और डायरेक्टर के ढेर सारी रोमांटिक फिल्मों की शूटिंग एकसाथ चल रही है. शायद ये हास्यास्पद लगे लेकिन अब मैं खुदको असुरक्षित महसूस कर रहा था. नज़रें झुकाकर किसी अपराधी की तरह मैं पार्क में प्रवेश कर रहा था क्योंकि इस प्रेम रस से ज़्यादा ज़रूरी मेरे लिए अव्यवस्था और गन्दगी की खबर निकालना था.

        आगे बढ़कर देखा तो पार्क में सफाई का आलम यह था कि रात को पेड़ों से गिरे पत्ते भी भोर अंधेरे साफ़ कर दिए गए थे. झाड़ू से बने लकीरों के निशान ज़मीन पर अब भी नज़र आ रहे थे. घास काटने की मशीनें आवाज़ करके कर्तव्यनिष्ठा दिखा रही थीं और खबर जैसा यहां कुछ भी न था. शायद यह मेरी ही गलती थी कि मैंने शहर का एक बड़ा और नामी पार्क चुन लिया था. फिर भी यहां आसपास के माहौल से ऐसा लग  रहा था मानो मैं किसी गलत गली में आ गया हूँ.

       देर न करते हुए खाली हाथ मैं वहां से लौटने को हुआ तभी माथा ठनका. प्रेम साधना में लीन युगलों की तपस्या को भंग करने  के लिए अप्सराओं रुपी गार्ड नदारद थे. गेट को छोड़कर पूरी पार्क में किसी सुरक्षा गार्ड की परछाईं तक नहीं दिखी तो मैंने तफ्तीश करने का मन बनाया. पता चला दिन और रात दोनों में 24-24 गार्ड तैनात होने चाहिए, लेकिन शायद वो भी प्रेमलीला में बाधा पहुंचाकर पाप के भागी नहीं बनना चाहते.

          लगभग हर पार्क में ऐसे दृश्य अब आम हो चलें हैं. इसका परिणाम यह है कि कोई भी सपरिवार पार्क में पिकनिक मनाने नहीं आना चाहता. मैं भी ऐसा करने की सलाह नहीं दूंगा. इससे तो बेहतर है कि आप पूरे परिवार के साथ सेंसरबोर्ड से 'ए' सर्टीफिकेट पाने वाली 'उड़ता पंजाब' फिल्म देख लें. आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता फैलाना अगर कहीं से भी तर्कसंगत लगता हो तो मैं इच्छुक जन को बहस के लिए आमंत्रित करना चाहूंगा.

           पार्क से निकलने से पहले बाहर बैठी महिला गार्ड से बातचीत में अलग ही पहलू सामने आया. परिवारों के पार्क में न आने के सवाल पर हंसते हुए बोलीं,'ये तो कपल-पार्क है न बाबू.' स्पष्ट जवाब देते हुए उन्होंने कहा 'मैं तो साफ़ बोलती हूँ. अगर ये प्रेमी पार्क न आएं तो पार्क कल ही बंद हो जाएगा. सुबह टहलने आने वालों ने मासिक पास बनवा रखे हैं, ऐसे लोग भी सैकड़ों में हैं. दिन भर पार्क में जमे रहने वाले जोड़ों की वजह से रोजाना हज़ारों टिकट बिकते हैं. उल्टी-सीधी हरकत करते पकड़े जाने लड़के-लड़कियां अपने दोस्तों को मम्मी-पापा बनाकर उनसे बात करवा देते हैं.'

           पार्क में बढ़ती प्रेमियों की भीड़ पर भी उन्होंने सटीक वजह बताई. कहा,'बड़े-बड़े घर के  लड़के-लड़कियां आते हैं.  मॉल जाएंगे तो पिक्चर देखने और खाने में कम से कम हज़ार पांच सौ रूपए का खर्च आएगा. यहां सुबह नौ से रात नौ बजे तक खुले पार्क में पांच रुपए में काम बन जाता है. बहुत ज़्यादा तो सौ-दो सौ रुपये तक कुछ खा पी लेते हैं. स्कूल-कॉलेज यूनीफार्म में लड़के-लड़कियां रोजाना आते हैं और टोकने पर लड़ने पर उतारू हो जाते हैं.

           यह लेख कई आधुनिक सोच वाले और मॉडर्निटी की पैरवी करने वालों को आपत्तिजनक लग सकता है. उनसे मैं पहले ही स्पष्ट कर दूं, आधुनिकता और विस्तृत सोच का पार्क में किसी की गोद में सिर झुकाने से कोई वास्ता नहीं है. आधुनिकता आचरण और दिखावे से पहले मानसिकता में दिखनी चाहिए. बेशर्मी आधुनिकता का पर्यायवाची  न कभी था और न हो सकता है.


           एक उपाय जो समझ आता है वो है पार्कों में सीसीटीवी कैमरे लगवाना और सुरक्षा गार्ड्स की सक्रियता. पार्क जिस उद्देश्य से बनाए गए थे वह पूरे हों तो परिणाम सुखद होंगे. वरना रोज़ प्यार के नाम पर चल रही अश्लीलता और इससे जुड़े अपराधों को नज़रअंदाज़ करते हुए पार्कों का नाम 'तोता मैना स्थल' ही कर दिया जाना चाहिए. साथ ही क्लबों की तरह इनमें भी बोर्ड लगने चाहिए,'एंट्री ओनली फॉर कपल्स!'
(सभी तस्वीरें: गूगल से साभार)

Sunday, 10 July 2016

हमारी सोच पर हावी होता सोशल मीडिया

           हमारे एक पुराने मित्र मिलते ही बिफर पड़े, 'कैसे पत्रकार हो भाई आप! स्विस बैंक में खाताधारकों के नाम पब्लिक हो गए और आपको खबर तक नहीं!' उनका दावा और गुस्सा देख एक पल को हम भी भौचक्के रह गए. इतनी बड़ी बात हो गयी और मुझे पता कैसे नहीं चला, मेरे तो पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. इससे पहले कि मैं उनसे कुछ पूछता, गुस्से में मुट्ठियां भींचते उन्होंने मेरी सारी आशंकाओं पर विराम लगा दिया. बोले,'व्हाट्सएप वगैरह चलाते हो कि नहीं? तुम मीडिया वालों ने तो पैसा खा रखा है, तुम क्यों सच बताओगे.'


हां, सही तो है. हम क्यों सच बताने लगे, सच बताने और हर छुपी बात सामने लाने का ठेका तो व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर पर आपके हितैषियों ने ले रखा है. जो कभी स्विस बैंक के खाताधारकों में पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को शामिल कर देते हैं तो कभी हेलन की फोटोशॉप तस्वीर को कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी की जवानी से जोड़ देते हैं. इतना ही नहीं ये हितैषी ही आपको ऐसा मैसेज भेज सकते हैं, जिसे तीन ग्रुप्स में फॉरवर्ड करते ही आपका फ़ोन 100 प्रतिशत चार्ज हो जायेगा, या फिर आपको 5 जीबी डेटा फ्री मिलेगा. हमारे बस में तो इतना सब नहीं है.
          बेशक आप समझ चुके होंगे मेरा इशारा किस तरफ है! यूं तो सोशल मीडिया संचार क्षेत्र में क्रान्ति लेकर आया है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसका उपयोग अफवाहों को फैलाने और झूठा प्रचार करने के लिए बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. यही नहीं, इससे जुड़े कुछ उदहारण शायद आपको बेवकूफाना लगें लेकिन करोड़ों लोग जानबूझकर ऐसी बेवकूफियां करते हैं और दूसरों को भी अपने कुटुंब में शामिल करना चाहते हैं.
         सिर्फ एक मैसेज और मेरे दोस्तों ने कुरकुरे खाना काम कर दिया, फ्रूटी पीनी छोड़ दी. इस मैसेज में कहा गया था कि कुरकुरे में प्लास्टिक है, सबूत पेश हुआ कि आप चाहें तो इसे जलकर देख लें, ये प्लास्टिक की तरह जलता है. और तो और कहा गया कि फ्रूटी की फैक्ट्री में कुछ एचआईवी पॉजिटिव वर्कर्स ने अपना खून फ्रूटी में मिला दिया है, तो सावधान आपको भी एचआईवी हो सकता है. सच तो यह है कि कुछ भी खाने-पीने से एड्स का वायरस नहीं फैलता, कुरकुरे भी प्लास्टिक नहीं स्टार्च की वजह से अलग तरह से जलता दिखता है. इन ख़बरों का सच से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन बड़े तबके ने इन पर विश्वास कर लिया. सिर्फ निरक्षर और पिछड़ा वर्ग ही नहीं, मॉडर्न सोसाइटी के पढ़े लिखे लोगों ने भी इस पर यकीन किया. 
           एक और बड़ी खबर व्हाट्सएप, फेसबुक सोशल मीडिया के ज़रिये तेजी से फैली, इसमें कहा गया कि राष्ट्रगान 'जन गण मन' को यूनेस्को ने बेस्ट राष्ट्रगान का खिताब दिया है. खबर फैलने की देरी थी कि बधाइयों का दौर शुरू हो गया. भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने ट्विटर पर बधाई भी दे डाली. बाद में यह खबर भी झूठ निकली. कुछ इसी तरह एक तस्वीर शेयर की जाने लगी जिसे नासा द्वारा दीवाली पर्व के वक़्त ली गई भारत की तस्वीर बताया जाने लगा. लोग धड़ाधड़ शेयर करते गए और मूर्ख बनते गए. जबकि इसका सच  तक कोई वास्ता नहीं था. ये तस्वीर भी फोटोशॉप से बनाई गई थी.
          ऐसे एक नहीं ढेरों उदाहरण मिलेंगे, मैसेज भी ऐसे जो कोई सपने में नहीं सोच सकता. यह फोटो शेयर करें, इसमें बनी मक्खी उड़ जाएगी. कमेंट में 'उठ' टाइप करें और तस्वीर में रेलवे ट्रैक पर लेटी लड़की खड़ी हो जाएगी. बेशक यह बेवकूफाना लगे लेकिन हैरानी होती है जब ऐसी तस्वीरों पर हज़ारों कमेंट और शेयर्स मूर्खता करने वालों की गवाही देते नज़र आते हैं. हमारी यह बेवकूफी कई बार किसी की छवि को धूमिल कर देती है, गलत खबर को लोगों तक पहुंचा देती है. सांप्रदायिक दंगों के रूप में भी ऐसी अफवाहों के दुष्परिणाम सामने  आते रहे हैं.
         बड़ा सवाल है कि हम ऐसा क्यों करते हैं? दोस्त को घंटों समझाने के बाद जब इस बात का जवाब पूछा तो बोले शेयर करने में हमारा क्या जाता है! किसको फुर्सत है जो हर मैसेज की की जांच और तफ्तीश करे.
 सच है, हमारा क्या जाता है! जाता कुछ भी न हो जनाब, तब भी आप उन मूर्खों की लिस्ट में जगह बना लेते हैं जिनमें तर्कशक्ति का अभाव है. क्या सही है और क्या गलत, क्या सच है और क्या झूठ, बिना पूरी बात जाने उसे दूसरों के हवाले करना शायद आपकी नज़र में गलत न हो, लेकिन खतरनाक ज़रूर है.

         अगर आप भी ऐसे मैसेज और तस्वीरों पर पल में यकीन कर इन्हें फॉरवर्ड और शेयर करने वालों में से हैं तो सोशल मीडिया आपके विचारों और सोचने-समझने की  प्रभावित कर रहा है. ज़रूरी है कि अभी संभल जाएं, वरना कल को स्विस बैंक के खाताधारकों की लिस्ट में अगर आपका नाम भी वायरल होने लगे तो मुझसे न कहिएगा. आपका एक मैसेज न फॉरवर्ड करना बड़ा कदम होगा, जो झूठ शायद किसी बड़े दंगे या घटना की वजह  बन सकता था, सिर्फ आपकी वजह से ख़त्म हो जाएगा.

        बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं लगता सच जानने में! अपने मैसेज को ले जाएं और गूगल सर्च के हवाले कर दें, थोड़ी ही देर में उसका सच सामने होगा. अगर आपके पास इतना वक़्त नहीं है, तो बुरा न मानिए लेकिन उसे दूसरों तक पहुंचाने  हक़ नहीं. अब हर कोई आप जितना स्मार्ट नहीं होता न, जो सच और झूठ के भेद को समझ ले. बेहतर होगा अगर अब आप सोशल मीडिया को यूज़ करें न कि वह आपको इस्तेमाल कर रहा हो.

Thursday, 19 May 2016

तो क्या आरक्षण ने छीना 'अंकित' का हक! टीना डाबी से ज्यादा नंबर, फिर भी डिस्कवालीफाइड?

'आरक्षण' एक शब्द, एक व्यवस्था और उससे जुड़े विवाद! कभी आरक्षण के लिए आगजनी, तो कभी रेलवे ट्रैक जाम... ये व्यवस्था देश की शिक्षा और समानता के अधिकार को किस तरह प्रभावित कर रही है इसका सही मायने में हम अंदाज़ा भी नहीं लगा पाए हैं.
   
 UPSC टॉपर टीना डाबी का नाम सुर्ख़ियों में कई दिन  तक छाया रहा और हम भी उनकी इस कामयाबी पर उन्हें सलाम करते हैं. लेकिन इसी बीच आज सामने आया एक नाम 'अंकित श्रीवास्तव', एक नाम जो दावा कर रहा है कि उसे टीना डाबी से 35 नंबर ज्यादा मिले हैं. केवल आरक्षण व्यवस्था के चलते 'कट-ऑफ' ज्यादा होने की वजह से अंकित इस परीक्षा में असफल करार दिए गए हैं.
    अंकित ने यह बात अपने फेसबुक प्रोफाइल पर लिखी. उन्होंने बस यूं ही टीना की मार्कशीट देखी तो सन्न रह गए. अंकित ने अपनी पोस्ट में लिखा,
      "अभी अचानक पढाई करते-२ एकदम से मन हुआ की किताबो को आग लगा के परिवार समेत इस अंदर तक सड़ चुके देश को छोड़ कर हमेशा-2 के लिए विदेश भाग जाऊं और वहीँ सुकून से नौकरी करूँ। अचानक ऐसे ख्याल आने का कारण पढाई से मन उचटना या बोर हो जाना कतई नहीं था, दरसल अभी युँ ही बैठे-2 UPSC की वेबसइट पर अपने पिछले साल के असफल प्रयास की मार्कशीट निहार रहा था….तभी जाने कहा से ख्याल आया की लाओ इस वर्ष की टॉपर टीना डाबी की मार्कशीट भी देखी जाये।बस फिर क्या था फटाफट रोल नंबर गूगल किया और मैडम की भी मार्कशीट खोल डाली और उसके बाद जो सामने दिखा वो ही शायद मेरी इस घनघोर निराशा और गुस्से का कारण बना। 
मेरे आश्चर्य की इंतहा नहीं रही जब मैंने देखा की मैडम का CSP 2015 स्कोर है 96.66 और मेरा अर्थात अंकित श्रीवास्तव का स्कोर है 103.5, इतना ही नहीं पेपर 2 में मेरे 127.5 अंक है और माननीय टॉपर महोदया के 98.7 (दोनों मार्कशीट्स का स्क्रीनशॉट इस पोस्ट में है, और उसे UPSC की वेबसाइट पे रोल नंबर्स की सहायता से जांचा भी जा सकता है) अर्थात मैंने CSP -2015 में टॉपर महोदया से 35 अंक ज्यादा प्राप्त किये हैं।आरक्षण-व्यवस्था की महिमा कितनी चमत्कारिक है, सच्चे अर्थों में आज इसका एहसास हुआ। याद रहे की ऐसा भी बिलकुल नहीं है की टीना डाबी समाज के वंचित तबके से सम्बन्ध रखती हैं। उनके माता और पिता दोनों इंजीनियरिंग सेवा के अधिकारी रहे हैं और वह भी हम जैसो की तरह एक खाते-पीते संपन्न मध्यम-वर्ग से आती हैं? ऐसे में बड़ा प्रश्न यह उठता है की क्या इसी प्रकार के सामजिक न्याय की अवधारणा पर इस देश का निर्माण हुआ है? मैं अपनी संभावनाओं में जरुरी सुधार कर आईएस बन सकूँ या ना बन सकूँ, पर क्या हमारी दिशा और दशा सही है? क्या हमारी वर्तमान चयन-प्रक्रियाएं आज सर्वश्रेष्ठ को चुनने की क्षमता रखती हैं? टीना डाबी सिर्फ एक उदाहरण हैं,
उन्होंने जो किया है उसके लिए उनके प्रयासों की जितनी भी प्रशंसा की जाये वो निःसन्देह कम है, यहाँ उद्देश उन्हें या उनकी उपलब्धियों को कमतर आंकना कतई नहीं है, और न ही अपनी कुंठा तुष्ट करना है । परन्तु एक प्रश्न यह भी निसंदेह उतना ही महत्वपूर्ण है की मेरे जैसे सैकड़ो निहायत ही क्षमतावान और समर्पित नौजवान, जो अपनी बड़ी-2 नौकरियां ठुकरा कर अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिनों के रोज 12-14 घंटे सिर्फ पढाई करते हैं, वो आज किसके द्वारा किये गए अन्यायों का दंश झेल रहे हैं? क्या आरक्षण व्यवस्था का पुनरावलोकन करने और उसे वर्तमान जातिगत व्यवस्था से अलग कर ‘वास्तविक आर्थिक और सामजिक पिछड़ेपन’ से सम्बद्ध करने का राजनैतिक साहस किसी में नहीं है? दुःखद, हमसे ज्यादा इस देश के लिए दुर्भागयपूर्ण है ये स्थिति!"
   अंकित का यह पोस्ट अपने आप में कई सवाल छोड़ता है. क्या अंकित सिर्फ इस लिए असफल रहा क्योंकि वह सामान्य वर्ग का है. क्या योग्यता से ज्यादा उसकी जाति से फर्क पड़ता है. अंकित ने साफ़ लिखा कि मुझे टॉपर कहलाने का शौक नहीं, लेकिन उसकी मेहनत को यह कहकर नज़रंदाज़ कर देना कि वह सामान्य है, कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता. अपनी अगली पोस्ट में अंकित ने इस बात का साफ़ शब्दों में ज़िक्र किया, साथ ही अपनी जन्मतिथि बताकर अपनी मार्कशीट पब्लिक भी कर दी.

 इसके बाद से ही अंकित का पहला पोस्ट फेसबुक ने 'कम्युनिटी स्टैण्डर्ड के अगेंस्ट' कहकर हटा दिया. हो सकता है इसके पीछे कोई दबाव रहा हो. शायद किसी को अभी से यह डर सताने लगा हो कि कहीं इस पोस्ट की वजह से शांत बैठे एक बड़े वर्ग के खून में उबाल न आ जाए.
 अंकित जैसे कितने ही युवा सिर्फ इस दोगली व्यवस्था की वजह से आज भी मात खा रहे हैं. अंकित के साथ मेरी सहानुभूति नहीं, मुझे उसपर गर्व है. शर्म तो इस व्यवस्था से आती है, और सहानुभूति उस मजूर नेतृत्व से है, जिसमें इस अनुचित व्यवस्था को बदलने का माद्दा नहीं. शायद यही समय है... विचार करो!

नोट- मैंने खुद अंकित और टीना डाबी की मार्कशीट्स देखी और कम्पेयर की हैं. और ये बिलकुल सही हैं.
आप भी चाहें तो आधिकारिक साईट पर जाकर इसकी पुष्टि कर सकते हैं.

Sunday, 8 May 2016

'माँ तू कहाँ है!'

सोचा आज माँ पर कविता लिखूं,
लिखने बैठा तो समझ न आया क्या लिखूं!

लिखूं उसके प्यार का गीत,
या त्याग की कहानी लिखूं।
हर खुशी है जिसकी मुझसे,
क्या उसकी ज़ुबानी लिखूं।

लिखूं ममता का आँचल,
गोद में मिलने वाला चैन लिखूं।
बीमार और बेचैन था जब,
तब क्यों भीगे उसके नैन लिखूं।

लिखूं वक़्त जो मेरे नाम किया,
जो दिया मुझे वो प्यार लिखूं।
लिखूं उसने चाहा मुझे कितना,
या फिर इसका आभार लिखूं।

क्यों लिखूं उस रिश्ते की कहानी चंद शब्दों में,
जिसे बयां करने को सारी ज़िन्दगी अधूरी है।
जिससे हूँ जिसका हूँ और जिसके लिए हूँ मैं,
कोई और नहीं एक 'माँ' वो मेरी है।

और हां!
हमारे इस जहाँ में, एक उनका भी जहाँ है,
जिन मासूमों को नहीं उनकी माँ का पता है।
हम आज शान से कहते हैं, मेरे पास माँ है!
वो बच्चे आज भी पूछ रहे,'माँ! तू कहाँ है?'

-: प्राणेश तिवारी (स्वरचित)